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अंत – दुर्गम का | Ant – Durgam ka

by Hind Patrika

अंत – दुर्गम का | Ant – Durgam ka : दिती के दो पुत्र थे- हिरण्यकश्यप व हिरण्याक्ष। हिरण्यकश्यप की संतानों में एक संतान दैत्य भी थी, जिसका नाम राहू था। उसका पुत्र दुर्गम बहुत ही शक्तिशाली था, परन्तु वह बहुत क्रूर तथा पापी स्वभाव वाला था। लोगों पर अत्याचार करना उसका शौक बन गया था।
जब दुर्गम सिंहासन पर बैठा और दैत्यों का राजा बन गया। उसने अपने एक मंत्री को बुलाया और उस से कहा, “अनेक बार ऐसा हुआ है कि दैत्यों ने स्वर्ग पर विजय प्राप्त कर देवताओं को स्वर्ग से भगा दिया, परन्तु देवता अपनी शक्ति तथा सिंहासन किसी न किसी तरह पुन: प्राप्त कर लेते हैं।

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अवश्य इसके पीछे कोई न कोई रहस्य है। आखिर यह रहस्य क्या है?” “दैत्यराज, यह रहस्य उनके पास के चार वेदों में है। उनके इन वेदों का ज्ञान ही उन्हें उनकी शक्ति पुन: प्राप्त करवाता है?” इसलिए दुर्गम ने तपस्या करनी आरम्भ कर दी, ताकि वह ब्रह्मा को प्रसन्न कर वेदों को प्राप्त कर सके। कई वर्षों की तपस्या के बाद ब्रह्मा जी ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान माँगने को कहा। दुर्गम बोले, “प्रभु, मैं सभी वेदों को

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अंत - दुर्गम का | Ant - Durgam ka

अंत – दुर्गम का | Ant – Durgam ka : देखना चाहता हूँ तथा आपसे एक प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे उनका संरक्षक बना दे.” भगवान् ब्रह्मा जी ने दुर्गम को यह वरदान दे दिया, परन्तु जैसे ही दुर्गम ने वेदों को अपने हाथों में लिया, वह उन्हें लेकर पाताललोक में किसी ऐसी जगह छुप गया, जहाँ उसे कोई भी ढूँढ़ नहीं सकता था। अब चूँकि वेदों की शक्ति देवताओं के लिए खो चुकी थी। सभी देवता तथा ऋषि उन वेदों में लिखे हुए यज्ञों को करने से सदैव युवा तथा स्वस्थ रहते थे।

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अंत – दुर्गम का | Ant – Durgam ka : जिसके कारण उनके चेहरों पर एक ओजस्वी चमक विराजमान रहती थी। वेदों के उनके पास न रहने से वहाँ अब वे लोग कोई यज्ञ नहीं कर पाते थे। अत: वृद्धावस्था शीघ्र ही उनके चेहरे पर दिखाई देने लगी। इधर पृथ्वी पर भगवान् को प्रसन्न करने के लिए भी कोई यज्ञ नहीं हो पा रहा था, इसलिए वहाँ बरसात नहीं हुई। पृथ्वी पर अकाल व सूखे ने अपना घर बन लिया जिसके कारण कई लोगों की मृत्यु हो गई। स्वर्ग में दुर्गम ने अनेक देवताओं- इन्द्र, कुबेर, अग्नि, वायु, वरुण, यमराज सभी को बंदी बना लिया। अब दैत्य और असुर स्वर्ग में स्वतन्त्र रूप से घूमने लगे।

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अंत - दुर्गम का | Ant - Durgam ka

अंत – दुर्गम का | Ant – Durgam ka : यह परिस्थिति देखकर कुछ देवता, भगवान् विष्णु के पास सहायता के लिए गए। उन्होंने सभी को जगत माता माँ भगवती के पास जाने की सलाह दी। सभी देवता, माँ भगवती के पास गए और सहायता माँगी। वे बोले, “माँ, जब आपने शुम्भ निशुम्भ तथा महिषासुर का संहार किया था तो आपने हमें वचन दिया था कि जब कभी भी हमें आपकी आवश्यकता होगी, आप हमारी सहायता करेंगी। आप तो अन्र्तयामी हैं और सभी कुछ जानती हैं कि क्या हो रहा है। हमारी शक्ति को पुन: प्राप्त करने में हमारी सहायता कीजिए।” माँ भगवती ने उन्हें एक पत्ती दी जो उनके शरीर पर उगी हुई थी और बोलीं, “यह पत्ती लो। यह तुम्हारी रक्षा करेगी और शीघ्र ही पृथ्वी पर वर्षा भी होगी।” उनके वचन सत्य साबित हुए, जल्द ही अकाल व सूखा समाप्त हो गया और पृथ्वी पर एक बार फिर से खुशहाली आ गई। तब माँ भगवती ने अपने शरीर से दस देवियों- काली, तारा, चिनमस्तक, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगुला, धूम्र, त्रिपुरा और मान्तंगी को जन्म दिया. इन दस देवियों तथा

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अंत - दुर्गम का | Ant - Durgam ka

अंत – दुर्गम का | Ant – Durgam ka : लगभग सौ सिपाहियों की सेना के साथ माँ भगवती ने दुर्गम के किले पर आक्रमण किया। शीघ्र ही महाकाली भी अपने चक्र के साथ वहाँ आ गई। इस युद्ध में कई दैत्य व असुर मारे गए और कई डर के मारे भाग गए। माँ भगवती दुर्गम के सामने आई और उससे बोली, “दुर्गम, तुम अपनी मृत्यु को अपने आप क्यों बुला रहे हो। इसलिये बेहतर होगा कि वेदों को मुझे वापस कर दो और शांति से जाकर पाताललोक में राज करो।” परन्तु दुर्गम ने मना कर दिया। यह सुन माँ ने दुर्गम की ओर अपने तीरों का काफिला छोड़ दिया। बाकी असुर भी अलग-अलग रूपों में माँ के सिपाहियों से लडे, परन्तु माँ के सैनिकों पर उनकी आसुरिक शक्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब माँ भगवती ने अपने त्रिशूल को उठाया और दुर्गम की ओर फेंक दिया। त्रिशूल सीधा जाकर दुर्गम की छाती पर वार किया और इस प्रकार वह अपनी मृत्यु को प्राप्त
हुआ। सभी देवतागण दुर्गम की मृत्यु से बहुत प्रसन्न हुए और सभी ने जोर-जोर से जय-जयकार की।

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