आत्मकथ्य – संस्मरण महादेवी वर्मा के द्वारा | Aatamkaty Sanskaran

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‘संस्मरण’ को मैं रेखा चित्र से भिन्न साहित्यिक विधा मानती हूं। मेरे विचार में यह अन्तर अधिक न होने पर भी इतना अवश्य है कि हम दोनों को पहचान सकें।
‘रेखाचित्र’ एक बार देखे हुए व्यक्ति का भी हो सकता है जिसमें व्यक्तिव की क्षणिक झलक मात्र मिल सकती है। इसके अतिरिक्त इसमें लेखक तटस्थ भी रह सकेंगे। यह प्रकरण हमारी स्मृति में खो भी सकता है, परन्तु ‘संस्मरण’ हमारी स्थायी स्मृति से सम्बन्ध रखने के कारण संस्मण के पात्र से हमारे घनिष्ठ परिचय की अपेक्षा रखता है, जिसमें हमारी अनुभूति के क्षणों का योगदान भी रहा है। इसी कारण स्मृति में ऐसे क्षणों का प्रत्यावर्तन भी सहज हो जाता है और हमारा आत्मकथ्य भी आ जाता है।

यदि हम किसी से प्रगाढ़ और आत्मीय परिचय रखते हैं, तो उसे व्यक्ति को अनेक मनोवृत्तियों तथा उनके अनुसार आचरण करते देखना भी सहज हो जाता है और अपनी प्रतिक्रिया की स्मृति रखना भी स्वाभाविक हो जाता है। इन्हीं क्षणों का सुखद या दुःखद प्रत्यावर्तन ‘संस्मरण’ कहा जा सकता है। मेरे अधिकांश रेखाचित्र कहे जाने वाले शब्द-चित्र ‘संस्मरण’ की कोटि में ही आते हैं, क्यों कि किसी भी क्षणमात्र की झलक पाकर मैं उसके सम्बन्ध में अपनी प्रतिक्रिया प्रायः अपने लेखों में व्यक्त कर देती हूं।

मेरे संस्मरणों के पात्र सामान्य जन तथा पशु-पक्षी ही रहते हैं और उनसे घनिष्ठ आत्मीयता का बोध मेरे स्वभाव का अंग ही कहा जा सकता है। पालित पशु-पक्षी तो जन्म से अन्त तक मेरे पास रहते ही हैं, अतः उनकी स्वभावगत विशेषताएँ जानकर ही उन्हें संरक्षण दिया जा सकता है। नित्य देखते-ही–देखते मैं उनके सम्बन्ध में बहुत कुछ जान जाती हूँ और उन पर कुछ लिखना सहज हो जाता है। रहे सामान्य जन तो उनसे सम्पर्क बनाये रखना मुझे मन की तीर्थ यात्रा लगती है। उनके सम्बन्ध में जो कुछ जान सकती हूं, उसे जानना सौहार्द की शपथ है, पर लिखना अपनी इच्छा पर निर्भर है।

मेरा यह सौभाग्य रहा है कि अपने युग के विशिष्ठ व्यक्तियों का मुझे साथ मिला और मैंने उन्हें निकट से देखने का अवसर पाया। उनके जीवन के तथा आचरित आदर्शों ने मुझे निरन्तर प्रभावित किया है। उन्हें आशा-निराशा, जय-पराजय, सुख-दुःख के अनेक क्षणों में मैंने देखा अवश्य, पर उनकी अडिग आस्था ने मुझ पर जीवनव्यापी प्रभाव छोड़ा है। उनके सम्बन्धों में कुछ लिखना उनके अभिन्नदन से अधिक मेरा पर्व-स्नान है। हम सूर्य की पूजा सूर्य को दिखाकर करते हैं। गंगाजल से गंगा को अर्घ्य देते हैं, क्योंकि यह पूजा हमारी उस कृतज्ञता की स्वीकृति है, जो उनके प्राप्त शक्ति से उत्पन्न हुई है।

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