हनुमान और राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh

हनुमान और राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh

हनुमान और राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh :  भगवान् राम चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या वापस लौटे, तो उन्हें अयोध्या का राजा बनाया गया। काशी के राजा इस राज्याभिषेक उत्सव की देखने के लिये अयोध्या आना चाहते थे। जब वह अपने रथ पर अयोध्या की ओर जा रहे थे, तो मार्ग में उन्हें नारद मुनि मिले। नारद बोले, “मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि तुम अयोध्या जा रहे हो। मुझे वचन दो कि मैं जैसा कहूँगा तुम वैसा ही करोगे”.
काशी के राजा ने वचन दिया. नारद बोले, ” जब तुम भगवान् राम के दरबार में पहुँचोगे, तो महर्षि विश्वामित्र को छोड़कर सभी का झुककर सम्मान करना। तुम उनकी तरफ जरा भी ध्यान मत देना।” “पर वह मुझसे क्रुद्ध हो जाएँगे, और सभी जानते हैं कि वे कितने क्रोधी स्वभाव के हैं।” काशी के राजा ने परेशान होकर कहा। परन्तु काशी के राजा नारद जी को पहले ही वचन दे चुके थे, इसलिये उनके कहे अनुसार चल पड़े। भगवान् राम के दरबार में पहुँचकर काशी के

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हनुमान ओर राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh

 

हनुमान और राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh :  राजा ने नारद के कहे अनुसार व्यहवार किया. शीघ्र ही विश्वमित्र एक राजा के इसप्रकार के दुव्य्ह्वार से क्रोधित हो गए. महर्षि विश्वमित्र भगवान् राम के पास गए और उनसे इस बात की शिकायत की. यह सुनकर भगवान् राम बहुत क्रोधित हो गये। राम ने कहा, “हे गुरुदेव, मैं आपको ये वचन देता हूँ कि काशी के राजा मेरे तरकश के तीन बाणों से मृत्यु को प्राप्त हाँगे।”

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भगवान् राम की इस घोषणा को सुनकर काशी के राजा सोचने लगे, “भगवान राम के हाथो इस तरह अपमानित होने से तो अच्छा है कि मैं आत्महत्या कर लूँ. इसीलिए मुझे सरयू नदी में जाकर डूब जाना चाहिये।” सरयू नदी पर पहुँचकर जैसे ही वह नदी में छलाँग लगाने लगे, नारद जी तुरन्त वहाँ आ गये। उन्हें वहाँ देखकर काशी के राजा बोले, “देखिए नारद मुनि, आपके शब्दों के अनुसार क्या हो गया। मैंने आपके कहे अनुसार अपने वचन को पूरा किया, और अब मेरा ही जीवन संकट में है। बताइये, मैं क्या करूं?” “घबराओ नहीं और मेरे साथ मेरी वीणा पर बैठो। मैं तुम्हें कन्चंगिरी ले जाऊँगा,” नारद बोले।

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हनुमान ओर राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh

हनुमान और राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh :  “पर मैं वहाँ क्यों जाऊँ?” “चलो, इसके बारे में मैं तुम्हें मार्ग में विस्तार से बताऊँगा।” अत: काशी के राजा, नारद मुनि की वीणा पर बैठ गये। मार्ग में नारद बोले, “कन्चंगिरी पर हनुमान की माता अंजना रहती हैं। तुम जाते ही उनके चरणों पर गिर जाना और उनके चरणों को तब तक मत छोड़ना जब तक वह तुम्हें तुम्हारे जीवन की सुरक्षा का वचन न दे दें?” जब वह कन्चंगिरी पहुँचे, तो काशी के राजा ने नारद के कहे अनुसार व्यवहार किया। जब अंजना ने वचन दिया कि मेरे होते हुए तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँचा सकता, तब काशी के राजा बोले, “माता, मेरे जीवन को भगवान् राम से भय है। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र से वादा किया है कि वो मुझे अपने तरकश के तीन बाणों द्वारा मृत्यु लोक में भेज देंगे।” इस प्रकार काशी के राजा ने सारी घटना अंजना को सुना दी। यह सुन अंजना हैरान हो गयी, उन्होंने अपने पुत्र हनुमान को याद किया और वे तुरन्त माता के सामने उपस्थित हो गये। अंजना ने काशी के राजा की समस्या हनुमान को बताई और बोली, “पुत्र हनुमान, मैंने इन्हें जीवन की रक्षा का वचन दिया हैं. इसके लिए मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है।” “परन्तु, माता मैं यह कैसे कर सकता हूँ?

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हनुमान ओर राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh

हनुमान और राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh :  “परन्तु, माता मैं यह कैसे कर सकता हूँ? भगवान राम तो मेरे गुरु हैं. अत: उनका शत्रु मेरा शत्रु है। फिर मैं उनके शत्रु को कैसे बचा सकता हूँ?” हनुमान बोले। परन्तु अंजना के बार-बार आग्रह करने पर हनुमान ने अपनी माँ की प्रार्थना मान ली। तब हनुमान काशी के राजा के पास गये और बोले, “तुम ऐसा करना कि सरयू नदी में कमर की गहराई तक खड़े हो जाना और भगवान् राम के नाम का लगातार जाप करते रहना। उनका नाम तुम्हारे होठों पर लगातार रहे, इस बात का ध्यान रखना। इसी बीच मैं भगवान् राम के पास जाकर प्रार्थना करूंगा कि वह तुम्हें क्षमा कर दें।” काशी के राजा ने हनुमान के कहे अनुसार कार्य किया। उधर हनुमान, भगवान् राम के पास गये और बोले, “मेरे प्रभु! एक बार आपने मुझसे कहा था कि जो कोई भी मेरे नाम का जप करेगा, मुझे उसकी रक्षा करनी पडेगी। क्या आपको याद है?” “हाँ हनुमान, मुझे याद है। उस व्यक्ति के समक्ष तो मृत्यु भी नहीं जा सकती।” भगवान् राम ने कहा।
“ठीक हैं प्रभु! मैं एक बार फिर से आश्वस्त हो गया.” ये कहकर हनुमान वहां से चले गए और सरयू नदी पर जाकर काशी के राजा की सुरक्षा करने लगे.

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हनुमान ओर राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh

हनुमान और राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh :  शाम होने पर ही श्री राम वहाँ पहुँचे। वह वहाँ काशी के राजा को मारने के लिये आये थे, ताकि विश्वामित्र को दिये गये वचन को पूरा कर सकें। भगवान् राम ने काशी के राजा को मारने के लिए एक बाण चलाया, परन्तु वह उतनी ही तेजी से वापस आ गया। फिर उन्होंने दूसरा बाण चलाया उसका भी वही पहले बाण जैसा हश्र हुआ। इसी तरह तीसरा बाण भी तरकश में वापस आ गया। बाणों से एक आवाज आयी, “प्रभु! मैं उस व्यक्ति को नहीं मार सकता, जो आपकी सुरक्षा में हो। विशेष कर तब जब वह आपके नाम का जाप कर रहा हो।” ऋषि वशिष्ठ भी वहाँ आ गये और उन्होंने हनुमान से राजा से दूर रहने को कहा, पर हनुमान बोले, “यदि मैं यहाँ से चला जाऊँगा तो भगवान् राम द्वारा मुझे दिए गए वचन का क्या होगा? उन्होंने कहा था कि उनके नाम का जाप करने वाले उनके भक्त को मृत्यु भी हानि नहीं पहुँचा सकती।

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हनुमान ओर राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh

हनुमान और राम में विरोध | Hanuman Aur Ram mein Virodh :  यदि मैं यहाँ से चला जाऊँगा, तो मेरे प्रभु झूठे साबित हो जायेंगे।” “अब मुश्किल यह भी तो है कि यदि राम विश्वामित्र को दिये गए वचन को पूरा नहीं करेंगे, तो लोग उन पर विश्वास करना छोड़ देंगे,” वशिष्ठ ने कहा। ऐसी स्थिति को देखकर वशिष्ठ, विश्वामित्र के पास गये और बोले, “महर्षि, भगवान् राम द्वारा आपको दिये गये वचन ने एक कठिन परिस्थिति पैदा कर दी है। अब भक्त और भगवान् के बीच विरोध होने की आशंका है। यदि आप काशी के राजा को उसकी धृष्टता के लिये क्षमा कर दें, तो समस्या का समाधान हो सकता है।” अत: हनुमान और भगवान् राम के बीच विरोध को रोकने के लिए विश्वामित्र थोड़ा नरम हो गये और सरयू नदी पर गये, जहाँ काशी के राजा, लगातार भगवान् राम के नाम का जाप कर रहे थे। उन्होंने राजा को नदी से बाहर बुलाया और कहा, “तुम मेरे चरण छूकर क्षमा माँग सकते हो कि तुम मेरा या किसी अन्य ऋषि मुनि का भविष्य में अपमान नहीं करोगे और न ही ऐसी कोई अन्य धृष्टता भरी हरकत करोगे।” काशी के राजा ने विश्वामित्र के चरण छूकर क्षमा माँगी। तब विश्वामित्र ने भगवान् राम को उनकी प्रतिज्ञा से मुक्त कर किया। बाद में काशी के राजा ने गुरु वशिष्ठ, भगवान् राम और हनुमान से भी उनके पैर छूकर क्षमा माँगी।
इस प्रकार हनुमान ने अपनी माता के वचन तथा दोनों का सम्मान बनाये रखा व न ही उन दोनों में कोई विरोध उत्पन्न होने दिया।

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