Hindi Poems On Nature | प्रकृति की कविताओं का संग्रह

Hindi Poems On Nature

Hindi Poems On Nature : प्रकृति की शुद्धता के बारे में व सुन्दरता के बारे में जितनी भी चर्चा व तारीफ करो कम ही हैं क्युकी क्या नहीं हैं प्रकृति में बात करने के लिए. जितना जिस चीज़ की शोभा को देखते ही आँखो में चमक आ जाती हैं और मन और दिल उसी चीज़ की तरफ यानीं प्रकृति की तरफ ही ढलने लगता हैं. दिल खोता ही जाता हैं उसकी असीम गहराई में. इतनी ठंडक मिलती हैं इन आँखों को इस प्रकृति की छाव में. कितने भाग्यशाली हैं हम जो जन्म मिला हमे इस प्रकृति की गॉड में और समझने की क्षमता रखते हैं हम की कितना प्यारा हैं ये जहा, कितना प्यारा हैं आसमान. क्या नहीं हैं यहाँ – क्या नहीं हैं यहाँ.

Hindi Poems on Nature

Hindi Poems On Nature : अगर प्यार करते हो प्रकृति से तो कुछ सहयोग तुम भी करो, पेड़ो को काटने से रोको और अगर अपनी तरफ से इतना नहीं कर सकते तो कम से कम एक पेड़ तो लगाओ ही लगाओ. और यहाँ comment section में जा कर आप भी अपनी कोई कविता हमसे बाँट सकते हैं. हम आपके विचारों का स्वागत करते हैं.
धन्यवाद!

Hindi Poems On Nature
मान लेना वसंत आ गया :
बागो में जब बहार आने लगे
कोयल अपना गीत सुनाने लगे
कलियों में निखार छाने लगे
भँवरे जब उन पर मंडराने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
खेतो में फसल पकने लगे
खेत खलिहान लहलाने लगे
डाली पे फूल मुस्काने लगे
चारो और खुशबु फैलाने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
आमो पे बौर जब आने लगे
पुष्प मधु से भर जाने लगे
भीनी भीनी सुगंध आने लगे
तितलियाँ उनपे मंडराने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
सरसो पे पीले पुष्प दिखने लगे
वृक्षों में नई कोंपले खिलने लगे
प्रकृति सौंदर्य छटा बिखरने लगे
वायु भी सुहानी जब बहने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
धूप जब मीठी लगने लगे
सर्दी कुछ कम लगने लगे
मौसम में बहार आने लगे
ऋतु दिल को लुभाने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
चाँद भी जब खिड़की से झाकने लगे
चुनरी सितारों की झिलमिलाने लगे
योवन जब फाग गीत गुनगुनाने लगे
चेहरों पर रंग अबीर गुलाल छाने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!

Hindi Poems On Nature
प्रकृति :
माँ की तरह हम पर प्यार लुटाती है प्रकृति
बिना मांगे हमें कितना कुछ देती जाती है प्रकृति…..
दिन में सूरज की रोशनी देती है प्रकृति
रात में शीतल चाँदनी लाती है प्रकृति……
भूमिगत जल से हमारी प्यास बुझाती है प्रकृति
और बारिश में रिमझिम जल बरसाती है प्रकृति…..
दिन-रात प्राणदायिनी हवा चलाती है प्रकृति
मुफ्त में हमें ढेरों साधन उपलब्ध कराती है प्रकृति…..
कहीं रेगिस्तान तो कहीं बर्फ बिछा रखे हैं इसने
कहीं पर्वत खड़े किए तो कहीं नदी बहा रखे हैं इसने…….
कहीं गहरे खाई खोदे तो कहीं बंजर जमीन बना रखे हैं इसने
कहीं फूलों की वादियाँ बसाई तो कहीं हरियाली की चादर बिछाई है इसने.
मानव इसका उपयोग करे इससे, इसे कोई ऐतराज नहीं
लेकिन मानव इसकी सीमाओं को तोड़े यह इसको मंजूर नहीं……..
जब-जब मानव उदंडता करता है, तब-तब चेतवानी देती है यह
जब-जब इसकी चेतावनी नजरअंदाज की जाती है, तब-तब सजा देती है यह….
विकास की दौड़ में प्रकृति को नजरंदाज करना बुद्धिमानी नहीं है
क्योंकि सवाल है हमारे भविष्य का, यह कोई खेल-कहानी नहीं है…..
मानव प्रकृति के अनुसार चले यही मानव के हित में है
प्रकृति का सम्मान करें सब, यही हमारे हित में है

Hindi Poems On Nature

Hindi Poems on Nature

काली घटा :
काली घटा छाई है
लेकर साथ अपने यह
ढेर सारी खुशियां लायी है
ठंडी ठंडी सी हव यह
बहती कहती चली आ रही है
काली घटा छाई है
कोई आज बरसों बाद खुश हुआ
तो कोई आज खुसी से पकवान बना रहा
बच्चों की टोली यह
कभी छत तो कभी गलियों में
किलकारियां सीटी लगा रहे
काली घटा छाई है
जो गिरी धरती पर पहली बूँद
देख ईसको किसान मुस्कराया
संग जग भी झूम रहा
जब चली हवाएँ और तेज
आंधी का यह रूप ले रही
लगता ऐसा कोई क्रांति अब सुरु हो रही
छुपा जो झूट अमीरों का
कहीं गली में गढ़ा तो कहीं
बड़ी बड़ी ईमारत यूँ ड़ह रही
अंकुर जो भूमि में सोये हुए थे
महसूस इस वातावरण को
वो भी अब फूटने लगे
देख बगीचे का माली यह
खुसी से झूम रहा
और कहता काली घटा छाई है
साथ अपने यह ढेर सारी खुशियां लायी है

Hindi Poems On Nature

काँप उठी…..धरती माता की कोख !! :

कलयुग में अपराध का
बढ़ा अब इतना प्रकोप
आज फिर से काँप उठी
देखो धरती माता की कोख !!

समय समय पर प्रकृति
देती रही कोई न कोई चोट
लालच में इतना अँधा हुआ
मानव को नही रहा कोई खौफ !!

कही बाढ़, कही पर सूखा
कभी महामारी का प्रकोप
यदा कदा धरती हिलती
फिर भूकम्प से मरते बे मौत !!

मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे
चढ़ गए भेट राजनितिक के लोभ
वन सम्पदा, नदी पहाड़, झरने
इनको मिटा रहा इंसान हर रोज !!

सबको अपनी चाह लगी है
नहीं रहा प्रकृति का अब शौक
“धर्म” करे जब बाते जनमानस की
दुनिया वालो को लगता है जोक !!

कलयुग में अपराध का
बढ़ा अब इतना प्रकोप
आज फिर से काँप उठी
देखो धरती माता की कोख !!

Hindi Poems on Nature
कुदरत :
हे ईस्वर तेरी बनाई यह धरती , कितनी ही सुन्दर
नए – नए और तरह – तरह के
एक नही कितने ही अनेक रंग !
कोई गुलाबी कहता ,
तो कोई बैंगनी , तो कोई लाल
तपती गर्मी मैं
हे ईस्वर , तुम्हारा चन्दन जैसे व्रिक्स
सीतल हवा बहाते
खुशी के त्यौहार पर
पूजा के वक़्त पर
हे ईस्वर , तुम्हारा पीपल ही
तुम्हारा रूप बनता
तुम्हारे ही रंगो भरे पंछी
नील अम्बर को सुनेहरा बनाते
तेरे चौपाये किसान के साथी बनते
हे ईस्वर तुम्हारी यह धरी बड़ी ही मीठी

Hindi Poems On Nature

बसंत का मौसम :

है महका हुआ गुलाब
खिला हुआ कंवल है,
हर दिल मे है उमंगे
हर लब पे ग़ज़ल है,
ठंडी-शीतल बहे ब्यार
मौसम गया बदल है,
हर डाल ओढ़ा नई चादर
हर कली गई मचल है,
प्रकृति भी हर्षित हुआ जो
हुआ बसंत का आगमन है,
चूजों ने भरी उड़ान जो
गये पर नये निकल है,
है हर गाँव मे कौतूहल
हर दिल गया मचल है,
चखेंगे स्वाद नये अनाज का
पक गये जो फसल है,
त्यौहारों का है मौसम
शादियों का अब लगन है,
लिए पिया मिलन की आस
सज रही “दुल्हन” है,
है महका हुआ गुलाब
खिला हुआ कंवल है…!!

Hindi Poems On Nature

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Hindi Poems on Nature
तेरी याद सा मोसम :
ह्बायों के रुख से लगता है कि रुखसत हो जाएगी बरसात
बेदर्द समां बदलेगा और आँखों से थम जाएगी बरसात .
अब जब थम गयी हैं बरसात तो किसान तरसा पानी को
बो वैठा हैं इसी आस मे कि अब कब आएगी बरसात .
दिल की बगिया को इस मोसम से कोई नहीं रही आस
आजाओ तुम इस बे रूखे मोसम में बन के बरसात .
चांदनी चादर बन ढक लेती हैं जब गलतफेहमियां हर रात
तब सुबह नई किरणों से फिर होती हें खुसिओं की बरसात .
सुबह की पहली किरण जब छू लेती हें तेरी बंद पलकें
चारों तरफ कलिओं से तेरी खुशबू की हो जाती बरसात .
नहा धो कर चमक जाती हर चोटी धोलाधार की
जब पश्चिम से बादल गरजते चमकते बनते बरसात

Hindi Poems On Nature

प्रकृति :
सुन्दर रूप इस धरा का,
आँचल जिसका नीला आकाश,
पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक,2
उस पर चाँद सूरज की बिंदियों का ताज
नदियों-झरनो से छलकता यौवन
सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार
खेत-खलिहानों में लहलाती फसले
बिखराती मंद-मंद मुस्कान
हाँ, यही तो हैं,……
इस प्रकृति का स्वछंद स्वरुप
प्रफुल्लित जीवन का निष्छल सार

Hindi Poems On Nature
फूल :

हमें तो जब भी कोई फूल नज़र आया है
उसके रूप की कशिश ने हमें लुभाया है
जो तारीफ़ ना करें कुदरती करिश्मों की
क्यों हमने फिर मानव का जन्म पाया है.

Hindi Poems On Nature

Hindi Poems on Nature

धरा की पुकार :
धरती माँ कर रही है पुकार ।
पेङ लगाओ यहाँ भरमार ।।
वर्षा के होयेंगे तब अरमान ।
अन्न पैदा होगा भरमार ।।
खूशहाली आयेगी देश में ।
किसान हल चलायेगा खेत में ।।
वृक्ष लगाओ वृक्ष बचाओ ।
हरियाली लाओ देश में ।।
सभी अपने-अपने दिल में सोच लो ।
सभी दस-दस वृक्ष खेत में रोप दो ।।
बारिस होगी फिर तेज ।
मरू प्रदेश का फिर बदलेगा वेश ।।
रेत के धोरे मिट जायेंगे ।
हरियाली राजस्थान मे दिखायेंगे ।।
दुनियां देख करेगी विचार ।
राजस्थान पानी से होगा रिचार्ज ।।
पानी की कमी नही आयेगी ।
धरती माँ फसल खूब सिंचायेगी ।।
खाने को होगा अन्न ।
किसान हो जायेगा धन्य ।।
एक बार फिर कहता है मेरा मन ।
हम सब धरती माँ को पेङ लगाकर करते है टनाटन ।।
“जय धरती माँ”

Hindi Poems On Nature

मौसम बसंत का :

लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का

गर्मी तो अभी दूर है वर्षा ना आएगी
फूलों की महक हर दिशा में फ़ैल जाएगी
पेड़ों में नई पत्तियाँ इठला के फूटेंगी
प्रेम की खातिर सभी सीमाएं टूटेंगी
सरसों के पीले खेत ऐसे लहलहाएंगे
सुख के पल जैसे अब कहीं ना जाएंगे
आकाश में उड़ती हुई पतंग ये कहे
डोरी से मेरा मेल है आदि अनंत का

लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का

ज्ञान की देवी को भी मौसम है ये पसंद
वातवरण में गूंजते है उनकी स्तुति के छंद
स्वर गूंजता है जब मधुर वीणा की तान का
भाग्य ही खुल जाता है हर इक इंसान का
माता के श्वेत वस्त्र यही तो कामना करें
विश्व में इस ऋतु के जैसी सुख शांति रहे
जिसपे भी हो जाए माँ सरस्वती की कृपा
चेहरे पे ओज आ जाता है जैसे एक संत का

लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का

Hindi Poems On Nature

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हम दर्द ऐ माँ :
जय भारत माँ
जय गंगा माँ
जय नारी माँ
जय गौ माँ ।।
माँ तुम्हारा ये प्यार है
हम लोगो का संस्कार है ।।
माँ तुम्हारा जो आशीर्वाद है
हमारे दिल मे आपका वास है ।।
माँ हमारे दिल की धङकन मे
तुम्हारे जीवन की तस्वीर है ।।
माँ हम तुम्हे अवश्य बचायेंगे
माँ तुम्हारे दूघ की ताकत को
दुनिया को दिखलायेंगे ।।
हम भारत माँ के वीर है
हम नारी माँ के पूत है
हम गौ माँ के सपूत है
हम गंगा माँ के दूत है ।।
हमने लाल दूध पिया है नारी माँ का
हमने पीला दूध पिया है गौ माँ का
हमने सफेद दूध पिया है गंगा माँ का
हमने हरा दूध पिया है भारत माँ का ।।
इस दूध की ताकत का अंदाज नही
दुश्मन की छाती को फाङे
हम पर ये अहसान नही
हमने लाल दूध पिया है नारी माँ का ।।

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Hindi Poems on Nature
गाँव मेरा :
इस लहलाती हरियाली से , सजा है ग़ाँव मेरा…..
सोंधी सी खुशबू , बिखेरे हुऐ है ग़ाँव मेरा… !!

जहाँ सूरज भी रोज , नदियों में नहाता है………
आज भी यहाँ मुर्गा ही , बांग लगाकर जगाता है !!

जहाँ गाय चराने वाला ग्वाला , कृष्ण का स्वरुप है …..
जहाँ हर पनहारन मटकी लिए, धरे राधा का रूप है !!

खुद में समेटे प्रकृति को, सदा जीवन ग़ाँव मेरा ….
इंद्रधनुषी रंगो से ओतप्रोत है, ग़ाँव मेरा ..!!

जहाँ सर्दी की रातो में, आले तापते बैठे लोग……..
और गर्मी की रातो में, खटिया बिछाये बैठे लोग !!

जहाँ राम-राम की ही, धव्नि सुबह शाम है………
यहाँ चले न हाय हेलो, हर आने जाने वाले को बस ” सीता राम ” है !!

भजनों और गुम्बतो की मधुर धव्नि से, है संगीतमय गाँव मेरा….
नदियों की कल-कल धव्नि से, भरा हुआ है गाँव मेरा !!

जहाँ लोग पेड़ो की छाँव तले, प्याज रोटी भी मजे से खाते है ……
वो मजे खाना खाने के, इन होटलों में कहाँ आते है !!

जहाँ शीतल जल इन नदियों का, दिल की प्यास बुझाता है …
वो मजा कहाँ इन मधुशाला की बोतलों में आता है…. !!

ईश्वर की हर सौगात से, भरा हुआ है गाँव मेरा …….
कोयल के गीतों और मोर के नृत्य से, संगीत भरा हुआ है गाँव मेरा !!

जहाँ मिटटी की है महक, और पंछियो की है चहक ………
जहाँ भवरों की गुंजन से, गूंज रहा है गाँव मेरा…. !!

प्रकृति की गोद में खुद को समेटे है गाँव मेरा ……….
मेरे भारत देश की शान है, ये गाँव मेरा… !!

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Hindi Poems on Nature

यह प्रकृति कुछ कहना चाहती है :
विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष
यह प्रकृति कुछ कहना चाहती है…..
यह प्रकृति कुछ कहना चाहती है ,
अपने दिल का भेद खोलना चाहती है ,
भेजती रही है हवाओं द्वारा अपना संदेशा।
ज़रा सुनो तो ! जो वह कहना चाहती है।
उसका अरमान ,उसकी चाहत है क्या ?
सिवा आदर के वो कुछ चाहती है क्या ?
बस थोड़ा सा प्यार ,थोड़ा सा ख्याल ,
यही तो मात्र मांग है इसकी ,
और भला वह हमसे मांगती है क्या ?
यह चंचल नदियां इसका लहराता आँचल ,
है काले केश यह काली घटाओं सा बादल ,
हरे -भरे वृक्ष ,पेड़ -पौधे और वनस्पतियां ,
हरियाली सी साड़ी में लगती है क्या कमाल।
इसका रूप -श्रृंगार हमारी खुशहाली नहीं है क्या? …
है ताज इसका यह हिमालय पर्वत ,
उसकी शक्ति-हिम्मत शेष सभी पर्वत ,
अक्षुण रहे यह तठस्थता व् मजबूती ,
क्योंकि इसका गर्व है यह सभी पर्वत।
इसका यह गौरव हमारी सुरक्षा नहीं है क्या ?…..
यह रंगीन बदलते हुए मौसम ,
शीत ,वसंत ,ग्रीष्म औ सावन ,
हमारे जीवन सा परिवर्तन शील यह ,
और सुख-दुःख जैसे रात- दिन।
जिनसे मिलता है नित कोई पैगाम नया , क्या ?….
इस प्रकृति पर ही यदि निर्भरता है हमारी ,
सच मानो तो यही माता भी है हमारी ,
हमारे अस्तित्व की परिभाषा अपूर्ण है इसके बिना ,
यही जीवनदायिनी व यही मुक्तिदायिनी है हमारी।
अपने ही मूल से नहीं हो रहे हम अनजान क्या ?…
हमें समझाना ही होगा ,अब तक जो ना समझ पाये ,
हमारी माता की भाषा/अभिलाषा को क्यों न समझ पाये ,
दिया ही दिया उसने अब तक अपना सर्वस्व ,कभी लिया नहीं ,
इसके एहसानों , उपकारों का मोल क्यों ना चूका पाये।
आधुनिकता/ उद्योगीकरण ने हमें कृतघ्न नहीं बना दिया क्या ?…

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विधाता :

कोन से साँचो में तूं है बनाता , बनाता है ऐसा तराश-तराश के ,
कोई न बना सके तूं ऐसा बनाता , बनाता है उनमें जान डाल के!

सितारों से भरा बरह्माण्ड रचाया , ना जाने उसमे क्या -क्या है समाया ,
ग्रहों को आकाश में सजाया , ना जाने कैसा अटल है घुमाया ,
जो नित नियम गति से अपनी दिशा में चलते हैं ,
अटूट प्रेम में घूम -घूम के, पल -पल आगे बढ़ते हैं !

सूर्य को है ऐसा बनाया, जिसने पूरी सुृष्टि को चमकाया ,
जो कभी नहीं बुझ पाया ,ना जाने किस ईंधन से जगता है ,
कभी एक शोर , कभी दूसरे शोर से ,
धरती को अभिनदंन करता है !

तारों की फौज ले के , चाँद धरा पे आया ,
कभी आधा , कभी पूरा है चमकाया ,
कभी -कभी सुबह शाम को दिखाया ,
कभी छिप -छिप के निगरानी करता है !

धरती पे माटी को बिखराया ,कई रंगो से इसे सजाया ,
हवा पानी को धरा पे बहाया, सुरमई संगीत बजाया ,
सूर्य ने लालिमा को फैलाया ,दिन -रात का चकर चलाया ,
बदल -बदल के मौसम आया ,कभी सुखा कभी हरियाली लाया !

आयु के मुताबिक सब जीवो को बनाया,
कोई धरा पे , कोई आसमान में उड़ाया ,
किसी को ज़मीन के अंदर है शिपाया ,
सबके ह्रदय में तूं है बसता ,
सबका पोषण तूं ही करता !

अलग़ -अलग़ रुप का आकार बनाया ,
फिर भी सब कुश सामूहिक रचाया ,
सबको है काम पे लगाया ,
नीति नियम से सब कुश है चलाया ,
हर रचना में रहस्य है शिपाया ,
दूृश्य कल्पनाओं में जग बसाया ,
सब कुश धरा पे है उगाया ,
समय की ढ़ाल पे इसमें ही समाया !

जब -जब जग जीवन संकट में आया ,
किसी ने धरा पे उत्पात मचाया ,
बन-बन के मसीहा तूं ही आया ,
दुनिया को सही मार्ग दिखाया ,
तेरे आने का प्रमाण धरा पे ही पाया ,
तेरे चिन्हों पे जग ने शीश झुकाया !

इस जग का तूं ही कर्ता ,
जब चाहे करिश्में करता ,
सब कुश जग में तूं ही घटता ,
पल पल में परिवर्तन करता !

बन बन के फ़रिश्ता धरा पे उतरना ,
इस जग पे उपकार तूँ करना ,
मानव मन में सोच खरी भरना ,
जो पल पल प्रकृति से खिलवाड़ है करता !

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महकते फूल :

बाग़ में खुशबू फैल गई , बगिया सारी महक गयी,
रंग-बिरंगे फूल खिले, तितलियाँ चकरा गईं,
लाल ,पीले ,सफ़ेद गुलाब ,गेंदा , जूही ,खिले लाजवाब ,
नई पंखुरियां जाग गयी, बंद कलियाँ झांक रही .
चम्पा , चमेली , सूर्यमुखी , सुखद पवन गीत सुना रही
महकते फूलों की क्यारी , सब के मन को लुभा रही,
धीरे से छू कर देखो खुशबू , तुम पर खुश्बू लुटा रही,
महकते फूलों की डाली, मन ही मन इतरा रही ,
हौले -हौले पाँव धरो, भंवरों की गुंजार बड़ी,
ओस की बूंदे चमक रहीं , पंखुरिया हीरों सी जड़ी,
सब को सजाते महकते फूल , सब को रिझाते महकते फूल,
महकते फूलों से सजे द्वार ,महकते फूल बनते उपहार …………

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जाड़ों का मौसम :

लो, फिर आ गया जाड़ों का मौसम ,
पहाड़ों ने ओढ़ ली चादर धूप की
किरणें करने लगी अठखेली झरनों से
चुपके से फिर देख ले उसमें अपना रूप ।

ओस भी इतराने लगी है
सुबह के ताले की चाबी
जो उसके हाथ लगी है ।

भीगे पत्तों को अपने पे
गुरूर हो चला है
आजकल है मालामाल
जेबें मोतियों से भरीं हैं ।

धुंध खेले आँख मिचोली
हवाओं से
फिर थक के सो जाए
वादियों की गोद में ।

आसमान सवरने में मसरूफ है
सूरज इक ज़रा मुस्कुरा दे
तो शाम को
शरमा के सुर्ख लाल हो जाए ।

बर्फीली हवाएं देती थपकियाँ रात को
चुपचाप सो जाए वो
करवट लेकर …

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खिलती कलियाँ :
रंग -बिरंगी खिलती कलियाँ,
गूंजे भँवरे उड़ती तितलियाँ ,
सूर्य -किरणे अब फैल गईं ,
कलियों का घूंघट खोल गईं
कली -कली को देख रही ,
देख -देख कर हंस रही,
मस्त पवन का झोंका आया ,
मीठे सुर में गीत सुनाया,
डाली -डाली लगी लहराने,
क्या मस्ती भी लगी छाने ,
देख-देख मन लुभाया ,
कली -कली का मन इतराया,
कितनी कलियाँ एक बगीचा ,
माली ने सब को है सींचा,
सींच-सींच कर बड़ा किया ,
कलियों ने मन हर लिया ,
ए माली मत हाथ लगाना,
कुम्हला न जाएँ इन्हें बचाना,
कली को फूल बदलते देखो ,
महकते फूलों की फुलवारी देखो |

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कहर :

रह रहकर टूटता रब का कहर
खंडहरों में तब्दील होते शहर
सिहर उठता है बदन
देख आतंक की लहर
आघात से पहली उबरे नहीं
तभी होता प्रहार ठहर ठहर
कैसी उसकी लीला है
ये कैसा उमड़ा प्रकति का क्रोध
विनाश लीला कर
क्यों झुंझलाकर करे प्रकट रोष

अपराधी जब अपराध करे
सजा फिर उसकी सबको क्यों मिले
पापी बैठे दरबारों में
जनमानष को पीड़ा का इनाम मिले

हुआ अत्याचार अविरल
इस जगत जननी पर पहर – पहर
कितना सहती, रखती संयम
आवरण पर निश दिन पड़ता जहर

हुई जो प्रकति संग छेड़छाड़
उसका पुरस्कार हमको पाना होगा
लेकर सीख आपदाओ से
अब तो दुनिया को संभल जाना होगा

कर क्षमायाचना धरा से
पश्चाताप की उठानी होगी लहर
शायद कर सके हर्षित
जगपालक को, रोक सके जो वो कहर

बहुत हो चुकी अब तबाही
बहुत उजड़े घरबार,शहर
कुछ तो करम करो ऐ ईश
अब न ढहाओ तुम कहर !!
अब न ढहाओ तुम कहर !!

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टूटे दरख़्त :

क्यूँ मायूस हो तुम टूटे दरख़्त
क्या हुआ जो तुम्हारी टहनियों में पत्ते नहीं
क्यूँ मन मलीन है तुम्हारा कि
बहारों में नहीं लगते फूल तुम पर
क्यूँ वर्षा ऋतु की बाट जोहते हो
क्यूँ भींग जाने को वृष्टि की कामना करते हो
भूलकर निज पीड़ा देखो उस शहीद को
तजा जिसने प्राण, अपनो की रक्षा को
कब खुद के श्वास बिसरने का
उसने शोक मनाया है
सहेजने को औरों की मुस्कान
अपना शीश गवाया है
क्या हुआ जो नहीं हैं गुंजायमान तुम्हारी शाखें
चिडियों के कलरव से
चीड़ डालो खुद को और बना लेने दो
किसी ग़रीब को अपनी छत
या फिर ले लो निर्वाण किसी मिट्टी के चूल्‍हे में
और पा लो मोक्ष उन भूखे अधरों की मुस्कान में
नहीं हो मायूस जो तुम हो टूटे दरख़्त……

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संभल जाओ ऐ दुनिया वालो :

संभल जाओ ऐ दुनिया वालो
वसुंधरा पे करो घातक प्रहार नही !
रब करता आगाह हर पल
प्रकृति पर करो घोर अत्यचार नही !!
लगा बारूद पहाड़, पर्वत उड़ाए
स्थल रमणीय सघन रहा नही !
खोद रहा खुद इंसान कब्र अपनी
जैसे जीवन की अब परवाह नही !!

लुप्त हुए अब झील और झरने
वन्यजीवो को मिला मुकाम नही !
मिटा रहा खुद जीवन के अवयव
धरा पर बचा जीव का आधार नहीं !!

नष्ट किये हमने हरे भरे वृक्ष,लताये
दिखे कही हरयाली का अब नाम नही !
लहलाते थे कभी वृक्ष हर आँगन में
बचा शेष उन गलियारों का श्रृंगार नही !

कहा गए हंस और कोयल, गोरैया
गौ माता का घरो में स्थान रहा नही !
जहाँ बहती थी कभी दूध की नदिया
कुंए,नलकूपों में जल का नाम नही !!

तबाह हो रहा सब कुछ निश् दिन
आनंद के आलावा कुछ याद नही
नित नए साधन की खोज में
पर्यावरण का किसी को रहा ध्यान नही !!

विलासिता से शिथिलता खरीदी
करता ईश पर कोई विश्वास नही !
भूल गए पाठ सब रामयण गीता के,
कुरान,बाइबिल किसी को याद नही !!

त्याग रहे नित संस्कार अपने
बुजुर्गो को मिलता सम्मान नही !
देवो की इस पावन धरती पर
बचा धर्म -कर्म का अब नाम नही !!

संभल जाओ ऐ दुनिया वालो
वसुंधरा पे करो घातक प्रहार नही !
रब करता आगाह हर पल
प्रकृति पर करो घोर अत्यचार नही !!

Hindi Poems On Nature 

चन्द्र :
ये सर्व वीदित है चन्द्र
किस प्रकार लील लिया है
तुम्हारी अपरिमित आभा ने
भूतल के अंधकार को
क्यूँ प्रतीक्षारत हो
रात्रि के यायावर के प्रतिपुष्टि की
वो उनका सत्य है
यामिनी का आत्मसमर्पण
करता है तुम्हारे विजय की घोषणा
पाषाण-पथिक की ज्योत्सना अमर रहे
युगों से इंगित कर रही है
इला की सुकुमार सुलोचना
नही अधिकार चंद्रकिरण को
करे शशांक की आलोचना

 

Hindi Poems On Nature 

निशि आभा :
मैं निशि की चंचल
सरिता का प्रवाह
मेरे अघोड़ तप की माया
यदि प्रतीत होती है
किसी रुदाली को शशि की आभा
तो स्वीकार है मुझे ये संपर्क
जाओ पथिक, मार्ग प्रशस्त तुम्हारा
और तजकर राग विहाग
राग खमाज तुम गाओ
मैं मार्गदर्शक तुम्हारी
तुम्हारे जीवन के भोर होने तक

Hindi Poems On Nature 

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बसंत :

एक बूंद ने कहा, दूसरी बूंद से
कहां चली तू यूँ मंडराए ?
क्या जाना तूझे दूर देश है,
बन-ठन इतनी संवराए
जरा ठहर ,वो बूंद उसे देख गुर्राई
फिर मस्ती में चल पड़ी, वो खुद पर इतराए,
एक आवारे बादल ने रोका रास्ता उसका,
कहा क्यों हो तुम इतनी बौराए ?
ऐसा क्या इरादा तेरा,
जो हो इतनी घबराए ?
हट जा पगले मेरे रास्ते से,
बोली बूंद जरा मुस्काए,
जो ना माने बात तू मेरी,
तो दूँ मैं तुझे गिराए,
चल पड़ी फिर वो फुरफुराए,
आगे टकराई वो छोटी बूंद से,
छोटी बूंद उसे देख खिलखिलाए,
कहा दीदी चली कहां तुम यूं गुस्साए ?
क्या हुआ झगड़ा किसी से,
जो हो तुम मुंह फुलाए ?
कहा सुन छोटी बात तू मेरी,
जरा ध्यान लगाए,
मैं तो हूं बूंद सावन की कहे जो तू,
तो लूँ खुद में समाए,
बरसे हूं मैं खेत-खलिहानो में,
ताल-सराबर दूं भरमाए,
वर्षा बन धरती पर बरसूं,
प्रकृति को दूं लुभाए,
लोग जोहे हैं राह मेरी,
क्यों हूं मै इतनी देर लगाए ?
सुन छोटी, जाना है जल्दी मुझे,
दूं मैं वन में मोर नचाए,
हर मन में सावन बसे हैं,
जाउं मैं उनका हर्षाए,
हर डाली सूनी पड़ी है,
कह आउं कि लो झूले लगाए,
बाबा बसते कैलाश पर्वत पर,
फिर भी सब शिवालय में जल चढ़ाए,
हर तरफ खुशियाँ दिखें हैं,
दूं मैं दुखों को हटाए,
पर तुम क्यों उदास खड़ी हो,
मेरी बातों पर गंभीरता जताए ?
कहा दीदी ये सब तो ठीक है,
पर लाती तुम क्यों बाढ कहीं पर कहीं सूखा कहाए ?
क्या आती नहीं दया थोड़ी भी,
कि लूं मैं उन्हें बचाय ?
न-न छोटी ऐसा नहीं है,
हर साल आती मैं यही बताए,
प्रकति से न करो छेड़छाड़ तुम,
यही संदेश लोगों को सिखाए,
पर सुनते नही बात एक भी,
किस भाषा उन्हें समझाए ?
समझ गई मैं दीदी तेरी हर भाषा,
अब न ज्यादा वक्त गँवाए,
मैं भी हूं अब संग तुम्हारे,
चलो अपना संदेश धरती पर बरसाए,
कर लो खुद में शामिल तुम,
लो अपनी रुह बसाए,
आओ चलें दोनों धरती पर,
इक-दूजे पर इतराए।
दिनकर :
मेरी निशि की दीपशिखा
कुछ इस प्रकार प्रतीक्षारत है
दिनकर के एक दृष्टि की
ज्यूँ बाँस पर टँगे हुए दीपक
तकते हैं आकाश को
पंचगंगा की घाट पर
जानती हूँ भस्म कर देगी
वो प्रथम दृष्टि भास्कर की
जब होगा प्रभात का आगमन स्न्गिध सोंदर्य के साथ
और शंखनाद तब होगा
घंटियाँ बज उठेंगी
मन मंदिर के कपाट पर
मद्धिम सी स्वर-लहरियां करेंगी आहलादित प्राण
कर विसर्जित निज उर को प्रेम-धारा में
पंचतत्व में विलीन हो जाएगी बाती
और मेरा अस्ताचलगामी सूरज
क्रमशः अस्त होगा
यामिनी के ललाट पर
बेरोजगारी

अरे ओ, जीवन से निराश योद्धाओ सुनो,
सड़क पर भटकते बेरोजगारों सुनो
अँधेरे से निकलेने को कुछ कर्म तो करो ।
अपनी स्थिती को मानकर कुछ शर्म तो करो।
कब तक कोसते रहोगे तुम,अपने सरकार को ?
क्या भुला दोगे तुम दुनिया के तिरस्कार को?
दुर्भाग्य से निकलने का जतन तो करो।
अपनी धड़कनों को समझने का प्रयत्न तो करो।
माँ को ढेरों तमन्ना थी,तेरे जन्म के बाद,
पिता ने देखे थे सपने दशकों बाद,
उनके ख्वाबों को आँखों में जगह तो दो।
संभल जायेंगे पाँव तेरे पहले सतह तो दो।
जन्म लेना, मर जाना, नियती है संसार की,
सोचा कभी, क्या वजह थी ? तेरे अवतार की,
मिट्टी हो जाएगी सोना, तुम स्पर्श तो करो।
कर रही इंतजार मंजिल, तुम संघर्ष तो करो।
मैं और मेरी कविता :

सालों बाद आज
बहुत सालों बाद
एक बार फिर
मुझे अपनी कविताओं की याद आई
और मैं लगा पलटने
अपनी पुस्तक के पन्ने

पन्नों से निकल निकल कविताएँ
मेरी कृतियाँ
लगी कसने फब्तियाँ
कहो कवि,
कैसे हो? क्यों आई फिर हमारी याद
इतने सालों के बाद?
हमें कर पुस्तकबद्ध
हो गये थे तुम निश्चिंत|

Hindi Poems On Nature 

वक्त कितना लगता है :

वक्त कितना लगता है,
दर्द को असहनीय बनने में,
वक्त कितना लगता हैं,
श्रेष्ट को कनीय बनने में,
अपनी जिंदगी से कभी
मत हारना क्योंकि
वक्त कितना लगता है
सड़क छाप को माननीय बनने में
वक्त कितना लगता है
इज्जत को तमाशा बनने में,
वक्त कितना लगता है
आशा को निराशा बनने में,
हमारी गलती है कि हम
प्रयास छोड़ देते हैं वरना
वक्त कितना लगता है
अज्ञानता को जिज्ञासा बनने में,
वक्त कितना लगता है
रिश्तों को टूट जाने में,
वक्त कितना लगता है
अपनों से छूट जानें में,
वाकिफ सब हैं
समाज के नियमों से मगर
वक्त कितना लगता है
समाज से दूर होने में।

Hindi Poems On Nature 

उँची उड़ान :
शाश्वत नभ मे उँची उड़ान का,
सपना मैने संजोया था
आसमान वीरान नही था
कुछ लोगो से परिचय भी था
पर चीलो की बस्ती मे
खुद को ही अकेला पाया था
उत्तर गये, दक्षिण गये
पूरब और पश्चिम भी गये
अपने पुलकित पँखो को फैलाकर
सारा जहाँ चहकाया था
जीने की चाह मे जीवन् बीत चला
अब अवशान की बेला आई
सोच रही क्या खोया क्या पाया
जो खोया वो मेरा ही कब था
जो पाया मैने कमाया था
क्षोभ नही इस अनुभव का मुझको
मैं जो भी हूँ इसने बनाया है
सोच रही हूँ घर हो आऊँ,
नभ पे बादल जो छाया है
कल्पनाओ की महज़ उड़ान थी,
आँखे खुली, और ये क्या
धूप निकल आया है

Hindi Poems On Nature 

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Hindi Poems on Nature
क्यों बोझ लगती है बेटियाँ इस समाज को :

वो दिन था बड़ा ही खास…..,
जब मैं आयी थी अपने माता-पिता के घर बनकर उल्लास
खुशी से अपनाया था दोनों ने अपनी बेटी को
फिर क्यूँ था गम, मेरे जन्म पर इस समाज को
क्यों इस समाज के आँखों में खटकी थी मैं
आखिर क्यों इस समाज को बोझ सी लगी थी मैं
जबकि मैं तो थी अपने माता-पिता के लिए खुशियों की बहार
क्यों इस संसार ने बेटियों के जन्म पर सबको डराया है
क्यों मेरे जन्म पर मेरी माँ को दोषी ठहराया है
क्यों पहुँचा दिया गया मुझे और मेरी माँ के सपनो को शमशान
क्यों न कर सके वो बेटे की जगह बेटी के जन्म पर अभिमान
बेटे अगर होते हैं समाज की जान
तो बेटियाँ भी होती हैं अपने कुल की शान
वंश बढ़ाते हैं बेटे तो नाम रौशन करती हैं बेटियाँ
माता-पिता के लिए तो बेटा हो या बेटी
दोनों ही होते है उनके लिए उनकी आन, बान, शान
फिर क्यों कि़या जाता है जन्म देने से इंकार बेटी को
आखिर क्यों मार दिया जाता है गर्भ में हीं बेटी को
क्यों न इस मानसिकता को बदलकर, इस कुरीति खत्म करें हम
बेटे-बेटी का भेद मिटाकर मानवता पर गर्व करें हम
ताकि बेटियों को मिल सके सुरक्षित कल
ताकि लिंग भेद से मुक्त हो आने वाला कल
जिस दिन बेटी जन्म लेती है, वो दिन होता है बड़ा ही खास
क्योंकि बेटा-बेटी दोनों हीं होते हैं बहुत खास

Hindi Poems On Nature 
अंतहीन:
ये कैसा हूनर है तुम्हारा
की बहते हुए को बचाकर
सहारा देते हो
और फिर बहा देते हो उसे
उसी झरने में ये कहकर
की वो इक नदी है
और तुम फिर आओगे उससे मिलने
उसका सागर बनकर
फिर ये दूरियाँ ख़त्म हो जाएँगी
ताउम्र के लिए
नदी परेशान रही
जलती रही, सुखती रही
सागर की किस्मत में
नदियाँ ही नदियाँ हैं
उसे परवाह नही
जो कोई नदी उस तक ना पहुँचे
और भी नदियाँ हैं
उसकी हमसफ़र बनने को
एक सदी बीत गयी
नदी के सब्र का बाँध
आज टूट सा गया है
नदी में बाढ़ आया है
आज उसमे आवेग है, उत्साह है
चली है मिलने अपने सागर से
बहा ले गयी अपना सब कुछ साथ
नदी सागर तट पर आ चुकी है
कितना कुछ जानना है, कहना है
तभी सागर ने पूछा
कहो कैसे आना हुआ
जम गयी वो ये सुनकर
कुछ देर के लिए, पर
अंदर की ग्लानि ने फिर से पिघला दिया
नदी ने मौन रहना ही ठीक जाना
सागर के करीब से अपना रुख़ मोड़ लिया
और सोच रही है, ऐसे मिलने से तो बेहतर था
वो अंतहीन इंतज़ार, जो उसे अब भी रहेगा

Hindi Poems On Nature 

इंसानियत :

इंसानी दुनिया का दस्तूर भी क्या बताऊ यारों.
यहाँ तो अमीरी से रिश्ते बनाये जाते हैं.
और गरीबी से रिश्ते छिपाये जाते है.
इस दुनिया में अब ऐसे हीं इंसानियत निभाई जाती है
दूसरों को हँसाने के लिए नहीं , रुलाने के लिए मेहनत की जाती है.
अपनी जीत के लिए नहीं , दूसरों की हार के लिए मेहनत की जाती है.
यहाँ तो लोग जुदा हैं अपने ही वजूद से.
क्योंकि यहाँ लोग अपने आप से ज्यादा दुसरो में व्यस्त रहा करते हैं.
इस दुनिया में अब इंसानियत शर्मिंदा है
यहाँ तो अपनों को छोड़ गैरों से रिश्ते निभाए जाते हैं.
अपनापन और प्यार कोई मायने नहीं रखता यहाँ,
यहां तो बस पैसो से रूप दिखाए जाते हैं .
भावनाओं का कोई मोल नहीं है आज कल यहाँ,
यहां तो बस रूप रंग से रिश्ते बनाये जाते हैं.
यहाँ तो बस शर्तों पर रिश्ते बनाये जाते हैं.
रिश्तों का एहसास कहीं गुम सा हो गया है यहाँ.
प्यार का वजूद कहीं दफ़न सा हो गया है यहाँ.
यहाँ तो बस रिश्ते मतलब से निभाए जाते हैं.
अपनो से नहीं पैसों से रिश्तेदारी निभाई जाती है
इस दुनिया में इंसानियत अब ऐसे ही निभाई जाती है!
इस दुनिया में इंसानियत अब ऐसे ही निभाई जाती है!
इस दुनिया में इंसानियत अब ऐसे ही निभाई जाती है!

Hindi Poems On Nature 

मोहन के धाम :
चलो चलो साथी हिल-मिल कर, मनमोहन के धाम,
मुरली की मीठी धुन बाजे, जहाँ प्रेम अविराम।।
गैया, पाहन और कदम्बें, सबकी जहाँ एक ही बोली,
छुपे जहाँ कण कण में मोहन, खोजत सब ग्वालन की टोली।
जहाँ कृष्ण की शीतल छाया, बाकी जग है घाम,
चलो चलो साथी हिल-मिल कर, मनमोहन के धाम।।१।।
छलके जहाँ भक्ति रस ऐसे, मुरली की मीठी धुन जैसे,
जहाँ गोपियाँ प्रेम मगन हों, भव-बन्धन छूटे ना कैसे,
जहाँ रचाते हर पल कोई, लीला मोरे श्याम,
चलो चलो साथी हिल-मिल कर, मनमोहन के धाम।।२।।

Hindi Poems On Nature 

बेटा हूँ मैं :

बहनों से अच्छा नहीं हूँ
ये पता है मुझे
पर इतना नकारा भी नहीं
जितना नकारा समझा है सबने मुझे
मेरे दर्द को भी कोई सुने, कुछ कहना चाहता हूँ मैं
पिताजी व्यस्त हैं, घर चलाने में
माँ व्यस्त है घर सम्भालने में
मैं किसी से कुछ नहीं कह पाता
पर मैं चाहता हूँ कोई मुझे भी समझे,
थोड़ी देर कोई मेरी बात भी सुने
बहनों के शादी की चिंता मुझे भी खूब सताती है
कई बार मेरी रातों की नींद भी उड़ जाती है
जब माँ के पसन्द की चीजें नहीं ला पाता हूँ
तो सच मानिए अपने जीवन को व्यर्थ पाता हूँ
पर ये दर्द मैं किसी से कह नहीं पाता हूँ,
पिताजी के जूते अब मेरे पैरों में आ जाते हैं
ख़ुश होने से ज़्यादा मैं छुप-छुप कर रोता हूँ
क्योंकि पिताजी के बराबर का हो गया हूँ मैं
पर फिर भी आज भी पिताजी हीं कमाने जाते हैं
मेरे दर्द को भी कोई सुने
अपने आप को सबसे हारा हुआ पाता हूँ मैं
कोई मेरा भी दर्द सुने, कुछ कहना चाहता हूँ मैं
बेटियों से कम नहीं हूँ मैं, जिम्मेदारियाँ निभाने में
बहनों का ख्याल रखने वाला प्यारा भाई हूँ मैं
माँ-पिता के कंधों के बोझ को कम करने वाला बेटा हूँ मैं
सबसे अलग… सबसे अनूठा हूँ मैं, क्योंकि बेटा हूँ मैं

Hindi Poems On Nature 

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चाँद :
आसमान की बाँहो मे
प्यारा सा वो चाँद
ना जाने मुझे क्यों मेरे
साथी सा लग रहा है

खामोश है वो भी
खामोश हूँ मैं भी
सहमा है वो भी
सहमी हूँ मैं भी

कुछ दाग उसके सीने पर
कुछ दाग मेरे सीने पर
जल रहा है वो भी
जल रही हूँ मैं भी

कुछ बादल उसे ढँके हुए
और कुछ मुझे भी
सारी रात वो जागा है
और साथ मे मैं भी

मेरे आस्तित्व मे शामिल है वो
सुख मे और दुख मे भी
फिर भी वो आसमाँ का चाँद है
और मैं……. जमी की हया !

Hindi Poems On Nature 
माँ की ममता :

माँ की ममता ईश्वर का वरदान है
सच पूछो तो माँ, इन्सान नहीं भगवान है
माँ के चरणों में जन्नत का हर रूप होता है
माँ में हीं ईश्वर का हर स्वरूप होता है
माँ, जो हर बच्चे के दिल की चाह होती है
मुसीबत में एक नई राह होती है
जो हर किसी के करीब नहीं होती
जो हर किसी को नसीब नहीं होती
माँ की एहमियत उनसे पूछो जिनकी माँ नहीं होती है
जो हर बच्चे की जान होती है
जो हर रिश्ते का मान होती है
सभी का एक मात्र अरमान होती है
हर किसी को माँ की ममता मिले, अपनी माँ से
कभी कोई न बिछड़े अपनी माँ से
यही है मेरी एक मात्र दुआ उस खुदा से
जिनकी माँ हो, उसे क्या पता कि माँ क्या होती है
माँ को जानना है तो उनसे पूछो जिनकी माँ नहीं होती है

 

Hindi Poems On Nature 
फिर आये तुम :
ये हल्की हल्की बूँदें , फिर मेरे को छूने को आ गयी
ये नाचती बहती हवाएं , ये मस्त फिज़ाएं
तबी मेरे आँख खुला नही था, न सूरज उठा था
लेकिन ऐहसास आ गयी , की तुम आ गयी
मन को खींच लिया तेरी पायल की चम् चम् आवाज़
जो कानॊ में गूंजे और लगे बहुत खास
और ले आई हे चेहक पंचियों की
बंजर ज़मीन को सांस देती हुई
ये बूँदें जगाये दिल में चाहत
ये बूँदें दे ज़िन्दगी को राहत
आये जो ये मौसम सुहाना

Hindi Poems On Nature 

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शहर :

शोर इतनी है यहाँ कि खुद की आवाज दब जाती है
धुंध इतना है कि कुछ भी नज़र नहीं आता।
चकाचौंध में दफन है तारे और चंद्रमा भी
पहले पता होता कि शहर ऐसा होता है……….
तो मैं भूलकर भी कभी शहर नहीं आता।।
खलल इतना है यहाँ दिखावे और बनावटों का
रोना भी चाहूँ तो आंखो से आंसू नहीं आता।
कोई मां तो कोई मासुक की यादों में डूब जाता है।
आकर सोचता है काश! वो शहर नहीं आता।।
इतनी भीड़ है कि खुद को भी पहचानना मुश्किल है
सोचता हूँ कि आईना बनाया क्यूं है जाता।
बदनसीब ही था वो कि गांवो में भूख न मिट सकी।
पेट की जद में न होता तो शहर नहीं आता।।
वक्त इतना भी नहीं कि कभी खुल कर हंस लूं
ठोकरें लगती है तो खुद को संभाला नहीं जाता।
तन्हाई और दर्द की दास्तां से भरी पड़ी है शहर
पहले जान जाता ये सब तो मैं शहर कभी नहीं आता।।
रक्त और स्वेद में यहाँ फर्क नहीं है कोई
शहर में रहकर भी शहर कोई जान नहीं पाता।
ऐसा लगता है सब जानकर अनजान बनते हैं
ऐसे नासमझ शहर में मैं कभी नहीं आता।।

 

Hindi Poems On Nature 

मेरा परिचय:
पता नही क्यू मै अलग खङा हूं दुनिया से !
अपने सपनो को ढूढता विमुख हुआ हूं दुनिया से !!
पता नही क्यूं मै इस दुनिया से अलग हूं !
मगर मै सोचता कि दुनिया मुझसे अलग है !!
पता नही क्यूं अब ताने सुन कष्ट नही होता !
पता नही क्यूं अब तानो का असर नही होता !!
पता नही क्यूं लोगो को है मुझसे है शिकायत !
पता नही क्यूं बिना बात के दे रहे है हिदायत !!
पता नही क्यूं लोगो की सोच है इतनी निर्मम !
पतानही क्यूं इस दुनिया की डगर है इतनी दुर्गम !!

ज़िन्दगी की धूप-छाँव :

कभी गम, तो कभी खुशी है ज़िन्दगी
कभी धूप, तो कभी छाँव है ज़िन्दगी . . . . . . .
विधाता ने जो दिया, वो अद्भुत उपहार है ज़िन्दगी
कुदरत ने जो धरती पर बिखेरा वो प्यार है ज़िन्दगी . . . . . .
जिससे हर रोज नये-नये सबक मिलते हैं
यथार्थों का अनुभव कराने वाली ऐसी कड़ी है ज़िन्दगी . . . . . .
जिसे कोई न समझ सके ऐसी पहेली है ज़िन्दगी
कभी तन्हाइयों में हमारी सहेली है ज़िन्दगी . . . . . . .
अपने-अपने कर्मों के आधार पर मिलती है ये ज़िन्दगी
कभी सपनों की भीड़, तो कभी अकेली है जिंदगी . . . . . . .
जो समय के साथ बदलती रहे, वो संस्कृति है जिंदगी
खट्टी-मीठी यादों की स्मृति है ज़िन्दगी . . . . . . . .
कोई ना जान कर भी जान लेता है सबकुछ, ऐसी है ज़िन्दगी
तो किसी के लिए उलझी हुई पहेली है ज़िन्दगी . . . . . . . .
जो हर पल नदी की तरह बहती रहे ऐसी है जिंदगी
जो पल-पल चलती रहे, ऐसी है हीं ज़िन्दगी . . . . . . . .
कोई हर परिस्थिति में रो-रोकर गुजारता है ज़िन्दगी
तो किसी के लिए गम में भी मुस्कुराने का हौसला है ज़िन्दगी . . . . . .
कभी उगता सूरज, तो कभी अधेरी निशा है ज़िन्दगी
ईश्वर का दिया, माँ से मिला अनमोल उपहार है ज़िन्दगी . . . . . . . .
तो तुम यूँ हीं न बिताओ अपनी जिंदगी . . . . . . . .
दूसरों से हटकर तुम बनाओ अपनी जिंदगी
दुनिया की शोर में न खो जाए ये तेरी जिंदगी . . . . . . .
जिंदगी भी तुम्हें देखकर मुस्कुराए, तुम ऐसी बनाओ ये जिंदगी

Hindi Poems On Nature 

उदयाचल :
जब भास्कर आते है खुशियों का दिप जलाते है !
जब भास्कर आते है अन्धकार भगाते है !!
जब सारथी अरुण क्रोध से लाल आता !
तब सारा विश्व खुशियों से नहाता !!
वह लोगो को प्रहरी की भांती जगाये !
लोगो के मन मे खुशियों का दिप जलाये !!
जब सारा विश्व सो रहा होता है !
वह दुनिया को जगा रहा होता है !!
उसके तेज से है सभी घबराते !
उसके आगे कोई टिक नही पाते !!
उसके आने से होता है खुशियों मे संचार !
उसके चले जाने से हो जाता अंधकार !!
उसके चले जाने से दुनिया होती निर्जन !
उसके आ जाने से धन्य होता जन-जन !!
यदी शुर्य नही होता यह शोच के हम घबराते !
बिना शुर्य के प्रकाश के हम रह नही पाते !!
शुर्य के आने से अन्धकार घबराता !
उसके तेज के सामने वह टीक नही पाता !!
इनके आने से होता धन्य-धन्य इन्सान !
सभी उन्हे मानते है भगवान !!
जब हिमालय पर आती उनकी लाली !
उनके आ जाने से हिम भी घबराती !!
इनके आ जाने से जीवन मे होता संचार !
आने से इनके होता प्रकाशमान संसार !!

Hindi Poems On Nature 

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सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं :

अपने देश के लिए कुछ कर पा रहा हूँ मैं !
क्योंकि सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं !!
तुम सब सो जाओ चैन से, देश को नुकसान नहीं पंहुचा पायेगा कोई,
क्योंकि सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं !!
मेरी चिंता मत करो माँ ! मैं खुश हूँ तुम सबको खुश देखकर !
क्योंकि सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं !!
मेरी चिंता मत करो पापा ! मैं देश को नुकसान नहीं पहुँचने दूंगा !!
क्योंकि सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं !!
मेरे प्यारे बच्चों तुम हमेशा मुस्कुराओ ! और धूम-धाम से दिवाली मनाओ !!
क्योंकि सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं !!
मैं भारत माँ के इस आँचल को उजड़ने नहीं दूंगा!!
क्योंकि सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं !!
इस दिवाली भी खुशियो से महकेगा मेरा देश!!
क्योंकि सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं!!
किसी आतंकी को सफल मैं होने नहीं दूंगा !!
क्योंकि सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं !!
दुश्मनों के नापाक इरादों को थामे बैठा हूँ मैं
क्योंकि भारत माँ का वीर सैनिक हूँ मैं
मेरे प्यारे देश वासियों तुम सब हमेशा खुश रहो
मेरे प्यारे देश वासियों तुम सब हर त्यौहार धूम-धाम से मनाओ !
क्योंकि सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं !!
क्योंकि सरहद पर दिवाली मना रहा हूँ मैं !!
क्योंकि भारत माँ का वीर सैनिक हूँ मैं……….

Hindi Poems On Nature 

कौन सुननेवाला है यह ?:

होती है रात, होता है दिऩ
पऱ न होते एकसाथ दोनों
प्रक्रुति में, मगर होती है
कही अजब है यही |
और कही नहीं यारों
होती है हमारी ज़िन्दगी में
रात ही रह जाता है अक्सर
दिन को दूर भगाकर |
एक के बाद एक नहीं,
बदलाव निश्चित नहीं,
लगता सिर्फ में नहीं सोचती यह,
लगता पूरी दुनिया सोचती है|
इसलिए तो प्रकृति को करते बर्बाद
क्योंकि जलते है प्रकृति माँ से
प्रकृति माँ की आँखों से आती आरज़ू
जो रुकने का नाम नहीं ले रही हे |
जो हम सब से कह रहे हे
अगर तुम मुझसे कुछ लेना चाहो
तो ख़ुशी-ख़ुशी ले लो
मगर जितना चाहे उतना ही लेलो |
यह पेड़- पौडे, जल, मिटटी, वन सब
तेरी तरह मेरे ही संतान हे
अपने भाईयों को चैन से जीने दो
गले लगाओ सादगी को मत बनो मतलबी |
लेकिन कौन सुननेवाला है यह?
कौन हमारी मा की आरज़ू पोछ सकत॓ है?

Hindi Poems On Nature 

समय बड़ा बलवान :

टिक ना सका इसके आगे, बड़े से बड़ा धनवान………………
समय बीत जाने पर, तुम बहुत पछताओगे
इतना अच्छा समय भला, तुम दोबारा कब पाओगे
समय बीत जाने पर इंसान बहुत पछताता है………………
व्यर्थ बिताया गया समय, भला कौन कहाँ कब पाता है
जो नहीं पहचानते हैं समय का मोल………………
कर नहीं पाते कोई भी अच्छा काम
नहीं कर पाते वो जग में ऊँचा अपना नाम………………
अगर जीवन में कुछ करना है………………
सबसे आगे बढ़ना है तो, समय के महत्व को पहचानो
और बढ़ाओ और अपना मान……………….
समय नहीं रुकता
हर कोई प्रतीक्षा करता है, पर समय इंतजार नहीं करता है भाई
चूका हुआ समय कभी वापस नहीं आता है भाई
जो समय को बर्बाद करते हैं, उनका जीवन हो जाता है दुखदाई
जो छात्र इसे चूक जाते हैं, वे बहुत पछताते हैं भाई
जो कृषक इसे चूक जाते हैं भाई, वे भूखों मरते हैं भाई
जो नरपति इसे चूक जाते हैं, वे भिखमंगे होते भाई
जो इसे नहीं चूकते हैं इसको, वे ही खुश होते हैं भाई
समय का उपयोग करने वाले, कमाल कर जाते हैं भाई
जो गरीब इसका उपयोग करते हैं, वे अमीर बन जाते हैं भाई
जो छात्र इसको नहीं चूकते हैं, वे सफलता की नई कहानी लिखते हैं भाई
जो कृषक न चूकते हैं इसको, अन्न से उनके घर भर जाते हैं भाई
जिनको जीवन की रीत पता है, वे कभी अपना समय नहीं गंवाते हैं भाई
इसलिए याद रखो… हर कोई प्रतीक्षा करता है, पर समय इंतजार नहीं करता है भाई

Hindi Poems On Nature 

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3 comments

  1. आसमान है देखो कैसा ,सारी दुनिया दिखलाता मानो जैसा।

  2. (सूर्य की किरणे)
    सूर्य कि किरण है सबसे प्यारी,
    ना होती तो होती अंधियारी,
    ना कोई वृक्ष ना कोई पौधा
    ना होता जीवन ऐसा,
    ना होती प्रकृतिक हमारी,
    जिन्हे देख होती हैरानी,
    ना होते बिखरते मोती और कलियाँ,
    यहाँ होता पानी ही पानी,
    ना होती जीवन की लडीयाँ,
    खिला -खिला है जीवन देखो,
    देखो सूर्य की किरण को देखो।।

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