Rabindranath Tagore

रबिन्द्रनाथ टैगोर : एक महान आत्मा

रबिन्द्रनाथ टैगोर का परिचय:

Rabindranath Tagore रबिन्द्रनाथ टैगोर इन्हें कवि कहू, गीतकार कहू, कहानीकार कहू, नाटककार कहू या एक विशेष प्रतिभा से धनी व्यक्ति कहू. ये एक ऐसे इंसान थे जिनमे प्रतिभाओं का खज़ाना भरा हुआ था, क्युकी ये अपने समय के जितने भी कठिन और महत्वपूर्ण विषय थे उनमे संगलित हो चुके थे और अपनी तरफ उन्होंने उन सभी विषयो में अपना एक बहुत गहरा और महतवपूर्ण योगदान दिया जिसे आज तक लोगो ने सराहा हैं, माना हैं और प्यार किया हैं. उन्हें उनके सम्मान में गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता हैं क्युकी जिस प्रकार गुरु सबसे बड़ा होता हैं और उसमे अथाह ज्ञान का भण्डार विद्यामान होता हैं उसी प्रकार रबिन्द्रनाथ टैगोर इस नाम के काबिल पुरुष थे. वे एक दार्शनिक, साहित्याकार, निबंधकार एवं चित्रकार भी थे. गुरुदेव के जितने भी लेख थे वे किसी व्यक्ति विशेष के ऊपर बहुत ही कम होते थे लेकिन उस समय के आम लोगो के बारे में लिखना उन्हें भली प्रकार से आता था और शायद यही कारण था जब आम लोगो उनके लेखो से रूबरू हुवे तो उन्होंने अपने अप को, खुद को उन लेखो में जुड़ा पाया क्युकी हम किसी चीज़ की ओर तभी आकर्षित होते हैं जब हम खुद को उन चीजों में देखते हैं. इसी कारणवश धीरे धीरे उनके लेखो कविताओं द्वारा आम लोगो में उनकी प्रसिद्दी बढ़ने लगी.

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आइये चलते हैं और शुरुवात करते हैं इस महान व्यक्ति के जन्म से:

Rabindranath Tagore – इनका जन्म 7 मई 1861 में एक धनी एवं समृद्ध परिवार में कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ था. इनके पिताजी का नाम देवेंद्रनाथ टैगोर और माताजी का नाम शारदा देवी था और ये अपने माता – पिता की 15वी संतान में से 14वे पुत्र थे. रविन्द्रनाथ टैगोर बचपन से हीं बहुत प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के व्यक्ति थे और इन्होने केवल छोटी उम्र से ही यानी की जब वो केवल 8 वर्ष के थे तभी इन्होने अपनी पहली कविता लिख डाली थी. 13 वर्ष की उम्र में उनकी पहली पत्रिका में छपने वाली कविता ‘अभिलाषा‘, ‘तत्त्वभूमि‘ नामक पत्रिका में छपी थी. इनकी शुरुवाती पढाई स्कूल से ना कर के घर से ही कराई गयी लेकिन केवल 6 वर्षो तक की पढ़ाई इन्होने सेंट ज़ेवियर स्कूल में की जो की 1868 से 1874 तक थी. उसके कुछ समय बाद ही वो वकील बनने की चाहत में इंग्लैंड चले गए थे उसके बाद लन्दन विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर यानी की केवल एक साल इंग्लैंड में रहने के बाद वे वापस स्वदेश आ गए थे. पिता देवेन्द्रनाथ का एक समाजसेवी एवं बुद्धिजीवी व्यक्तित्व का व्यक्ति होने के कारण रबिन्द्रनाथ पर इस चीज़ का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा था और यही कारण था उनके वकील बनने की चाहत के पीछे. इनका जन्म एक बांग्ला परिवार में होने के कारण इनको अपनी भाषा से अत्यधिक प्रेम था और यही कारण था की शुरुवात में इन्होने इसी भाषा में अपने लेख लिखे थे और उन्ही से देश भर में ख्याति प्राप्त की थी. उनके बारे में एक सबसे रोचक और गौरवानित बात यह हैं की वे एशिया के सबसे पहले प्रथम नोबेल परुस्कार से पुरस्कृत व्यक्ति हैं. वैसे तो दुनिया भर में शुरुवात से ही हमारे सामने बहुत सारे प्रसिद्ध कविताओं और गानों के रचयताओ के नाम यदि हम याद करना चाहे तो पूरी एक कवियों की कतार हमारी आँखों के सामने तैरने लग जाती हैं लेकिन इतिहास के पन्नो में केवल एक ही ऐसे कवि (रबिन्द्रनाथ टैगोर) का नाम शुमार हैं जिसकी दो – दो कविताए वर्तमान समय में दो – दो देशो के राष्टगान का दर्ज़ा जिन्हें प्राप्त हैं और वो हैं भारत राष्ट्र का ‘जन गन मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता’ और बांग्लादेश का ‘आमार सोनार बांग्ला

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गुरुदेव का विवाह:

Rabindranath Tagore – रबिन्द्रनाथ टैगोर का विवाह 1883 में यानी की जब वो 22 वर्ष के थे उस समय उनका शादी मृणालिनी देवी के साथ कराया गया. उसके पश्चात उन्होंने अपनी दूसरी शादी प्रतिमा देवी नामक एक विधवा औरत के साथ की लेकिन उनका उद्देश्य विधवाओ को भी जीवन जीने और दोबारा शादी करने को लेकर प्रेरणा देना था.

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रबिन्द्रनाथ के प्रसिद्द लेख :

Rabindranath Tagore – वैसे तो टैगोर ने अपनी ज़िन्दगीभर में बहुत से लेख लिखे, बहुत चित्र्कारियाँ की, बहुत कविताए एवं गाने भी बुने. परन्तु उनमे से जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हुवे वे कुछ इस प्रकार हैं जिसमे की सबसे पहले नंबर पर गीतांजलि आती हैं और इसकी सबसे ख़ास बात ये हैं की जब इसका अनुवाद रबिन्द्रनाथ टैगोर द्वारा अंग्रेजी भाषा में किया गया तो इसी गीतांजलि किताब के जरिये उनका नाम भारत से से बाहर निकल कर पुरे विश्व में छा गया. इसकी बाद की जो किताबो के नाम हैं वे हैं शिशु भोलानाथ, पूरबी प्रवाहिनी, नैवेद्य मायेर खेला, परिशेष, महुआ, वनवाणी, पुनश्च, चोखेरबाली, वीथिका शेषलेखा, कणिका, और क्षणिका आदि शामिल हैं. इसके बाद 1905 वो दौर था जब वे एक बहुत बड़े कवि के रूप में पूरी दुनिया में विख्यात हो चुके थे.

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नामचीन हस्तियों पर रबिन्द्रनाथ टैगोर का प्रभाव :

Rabindranath Tagore – टैगोर का व्यहवार और उनके विचार ऐसे थे की आम लोगो के बीच उनकी लोकप्रियता तो मशहूर थी ही बल्कि उनके इतने चुम्बकीय आकर्षित विचारों को बड़े से बड़े लोग भी उनके व्यक्तित्व और उनके विचारों के कायल थे. जिनमे से इतिहास के सबसे बड़े वैज्ञानिको की सूची में शामिल एल्बर्ट  आइंस्टीन भी थे. आइंस्टीन गुरुदेव को ‘रब्बी टैगोर‘ कहकर बुलाते थे. ‘रब्बी‘ शब्द का अर्थ यहूदी भाषा में गुरु के रूप में किया जाता हैं और उनका टैगोर को रब्बी कहने का साक्ष्य उनके बीच के पात्र व्यहवार में मिलता हैं. इनकी मुलाक़ात आपस में केवल 3 बार हुई थी और वो भी बर्लिन में लेकिन आप सोच ही सकते हैं की केवल इन 3 मुलाकातों में किस तरह से आइंस्टीन रबिन्द्रनाथ ठाकुर के विचारों के कायल हुवे की उन्हें आइंस्टीन ने ‘रब्बी‘ बुलाना शुरू कर दिया. ये चीज़ अपने अपने में बहुत अनूठी और सुंदर हैं. इसके बाद हम बात करते हैं हमारे देश के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जिन्हें खुद महात्मा की उपाधि टैगोर ने ही दी. उन्होंने ही पहली बार देश में गांधीजी को महात्मा कह कर पुकारा था. हालांकि ये बात काफी अलग हैं की वे एक दुसरे का बहुत सम्मान करते थे परन्तु फिर भी दोनों के विचारो में काफी अंतर हमे देखने को मिल जाता हैं जैसे महात्मा गाँधी के लिए सबसे ऊपर वे राष्टवाद को समझते हैं उसी प्रकार रबिन्द्रनाथ टैगोर के लिए सबसे ऊपर मानवता के लिए जगह हैं.

रबिन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा ‘सर’ की उपाधि को लौटना :

Rabindranath Tagore – इसी मानवता की खातिर उनको अंग्रेजो द्वारा जो ‘सर‘ की उपाधि मिली थी उन्होंने लौटा दी थी. हुआ यूँ था की उस समय पुरे हिन्दुस्तान में स्वतंत्रता के लिए क्रांति और आन्दोलनों की ज्वाला भड़क रही थी. महात्मा गाँधी ने उस समय अपने अहिंसावादी विचारों को लोगो के सामने रखा था की चाहे कुछ भी हो जाए हमे बिना अहिंसा किये ही अपना गुस्सा ज़ाहिर करना हैं, अपने आन्दोलन करने हैं. इसी चीज़ को सहयोग देने के लिए पंजाब के अमृतसर शहर में जलियावाला बाघ में हजारो की संख्या में भारतीयों ने पहुच कर अपना शांति एवं अहिंसावादी गुस्सा प्रकट करने के लिए वह पहुचे परन्तु जनरल डायर ने अपनी सेना द्वारा सबको गोलियों से छलनी का आदेश दे दिया था. और इस बात से पूरा हिन्दुस्तान बौखला गया था गांधीजी ने किसी तरह सबको शांत कराया और इसी गुस्से का प्रदर्शन करते हुवे रबिन्द्रनाथ टैगोर ने अंग्रेजो द्वारा दी गयी ‘सर‘ की उपाधि को वापस लौटा दिया था इसी कारणवश जो अंग्रेजी अखबार और पत्रिकाए थी उनमे टैगोर की बहुत ज्यादा निंदा की गयी थी.

शान्तिनिकेतन की स्थापना:

Rabindranath Tagore – रविंद्रनाथ एक प्रकृति प्रेमी व्यक्ति थे. ये बात हम उनके लेखो को पढ़ कर भली प्रकार से जान सकते हैं. और इसका जीता – जागता प्रमाण हमारे सामने हैं उनके द्वारा की गयी शांति निकेतन की स्थापना जिसे उन्होंने एक हरे भरे जगह में बनाया, चारो तरफ पेड़ पौधों की हरियाली ने उस जगह को प्रकृति द्वारा सुशोभित कर रखा था एवं हरियाली और प्रकृति का सानिध्य उन्हें बहुत भाता था. उनका मानना था की विद्यार्थीयो की शिक्षा प्रकृति की छत्र छाया में ही होनी चाहिए यानी की उनके चारो तरफ एक हरा भरा माहौल होना चाहिए इसीलिए उन्होंने शान्तिनिकेतन आश्रम की स्थापना की जहाँ पर की सुंदर सुंदर बाग़ – बगीचे के बीच एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी हैं.

शान्तिनिकेतन का आर्थिक तंगी से जूझना :

Rabindranath Tagore – एक तरफ जब रबिन्द्रनाथ टैगोर ने शान्तिनिकेतन की स्थापना करवाई थी उसके बाद एक समय ऐसा आया जब वो आश्रम आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. उसका कारण यह था की उसको सरकारी आर्थिक सहयोग मिलना बंद हो गया था यानि की सरकार की तरफ से आश्रम को पैसे नहीं पहुचाए जा रहे थे. और वहाँ पर विद्यार्थी ना जा सके इसके लिए उनके घरो में धमकी भरी चिट्ठिया भेजी जाने लगी. रबिन्द्रनाथ टैगोर उस समय खुद भी आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं हो पाए की खुद उस आश्रम को उस तंगी से बाहर निकाल सके. उस समय गांधीजी ने 60,000 रुपये देकर गुरुदेव की मदद की थी.

रबिन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु :

Rabindranath Tagore – 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्रनाथ टैगोर, एक महान व्यक्ति जो हम सबके गुरुदेव हैं. एक ऐसा इंसान जो भारत माता का ऐसा सपूत बनकर आया जिसने पूरी दुनिया में अपने विचारों का प्रकाश पुरे विश्व में बिखेर दिया और सदा – सदा के लिए सबके दिलो में अमर होकर रह गया.

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Hind Patrika

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