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Self Composed Poem on Mother in Hindi | माँ का अतुल्य प्रेम

by Hind Patrika

Self Composed Poem on Mother in Hindi

Self Composed Poem on Mother in Hindi : यहाँ पर कविताओं का जो संग्रह दिया गया हैं ये कुछ सुंदर से कान्ट छांट कर के हम आपके लिए लाये हैं. क्यूंकि यहाँ पर आपको सिर्फ सुंदर माँ की ही कविताओं का संग्रह मिलेगा. आपको इन में से जो भी कविता प्रिय लगी हो तो उसके बारे में हमे comment section में जा कर अवश्य सूचित कीजियेगा.. इसके अलावा यदि आपके पास माँ की कविता का कोई संग्रह हैं तो भी आप हमसे और अन्य पाठको से बाँट सकते हैं. और यदि किसी और विषय पर आप अपने विचार लोगो तक पहुँचाना चाहते हैं तो हमारे contact menu में जा कर हमसे संपर्क करे. हम आपका article अवश्य छापेंगे.
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Self Composed Poem on Mother in Hindi

अंधियारी रातों में (Self Composed Poem on Mother in Hindi)

अंधियारी रातों में मुझको
थपकी देकर कभी सुलाती
कभी प्यार से मुझे चूमती
कभी डाँटकर पास बुलाती

कभी आँख के आँसू मेरे
आँचल से पोंछा करती वो
सपनों के झूलों में अक्सर
धीरे-धीरे मुझे झुलाती

सब दुनिया से रूठ रपटकर
जब मैं बेमन से सो जाता
हौले से वो चादर खींचे
अपने सीने मुझे लगाती

 

 

jisne hame chalna sikhaya (Self Composed Poem on Mother in Hindi)

jisne hame chalna sikhaya…ham unhe har bat mai rok dete hai
jisne hame bolna sikhaya…unki har bar ko tok dete hai
jisne apne khun se sichkar hame bada kiya…bade hokar ham unhi ka khoon choos lete hai
kabhi dard hota tha hame to poori rat maa nahi soti thi…aaj usi ma ko itna dard de dete h ki maa ab bhi puri rat nhi soti hai……ohhhh god
kaise sehti h bo sab chup chap aur kuch gila shikba bhi nhi karti maa ma nahi hoti devi maa hoti hai
aaj bhi yaad hoga sabko jab ham rat mai dar se uthkar rone lagte the…to maa turant uthkar thapaki dekar sula deti thi
aur aaj bo ma rat mai dard se karah de to ham use dant kar sula dete hai….
insaan tu soch jara kaise bhala hoga tera ki budhape mai tera thode se pyaar ke liye Roti rehti hai maa

 

 

 

माँ की ममता (Self Composed Poem on Mother in Hindi)

जन्म दात्री
ममता की पवित्र मूर्ति
रक्त कणो से अभिसिंचित कर
नव पुष्प खिलाती

स्नेह निर्झर झरता
माँ की मृदु लोरी से
हर पल अंक से चिपटाए
उर्जा भरती प्राणो में
विकसित होती पंखुडिया
ममता की छावो में

सब कुछ न्यौछावर
उस ममता की वेदी पर
जिसके
आँचल की साया में
हर सुख का सागर!

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Poem on Maa in Hindi (Self Composed Poem on Mother in Hindi)

” माँ Maa “

समुन्दर की लहरे सुनहरी रेत, श्रद्धानत तीर्थ यात्री , रामेश्वरम द्वीप की वो छोटी सी दुनिया सबमे तू निहित , सब तुझमे समाहित,
तेरी बहो में पला में , मेरी कायनात रही तू , जब छिड़ा विश्वयुद्ध छोटा था में ,जीवन बना था चुनौती , ज़िंदगी अमानत , मिलो चलते थे हम |
पहुंचते किरणों से पहले कभी जाते मंदिर लेने स्वामी से ज्ञान , कभी मौलाना के पास लेने अरबी का सबक|

Station को जाती रेत भरी सड़क
बेचे थे मैंने अख़बार
चलते फिरते साहित्य
दिन में school शाम में पढ़ाई मेहनत ,मशकत, दिक्कतें , कठनाई
तेरी पाक शक्शियत ने बनायीं मधुर यादें.

जब तू झुकती नमाज़ में उठाये हाथ
अल्लाह का नूर गिरता तेरी झोली में और बरसता मेरे पर और मेरे जैसे कितने नसीब वालो पर
दिया तूने हमेशा दया का दान
याद है अभी जैसे कल ही 10 वर्ष का था|
में सोया तेरी गोद में , बाकि बच्चों की ईर्ष्या का बना में पात्र
पूर्णमासी की रात में भर्ती जिसमे तेरा प्यार
अधि रात में अंधमुधि आँखों से तकता तुझे , थामता आंसू पलकों पर, घुटनो के बल बहो में घेरे तुझे खड़ा था
तूने जाना था मेरा डर , अपने बच्चे की पीड़ा तेरी उंगलियों से निथरा था दर्द मेरे बालों से और भरी थी मुझमे विश्वास की शक्ति
निर्भय हो जाने की और जीतने की शक्ति

जिया में! मेरी माँ और जीता में !
क़यामत के दिन मिलेगा तुझसे तेरा कलाम माँ तुझे मेरा सलाम

 

Self Composed Poem on Mother in Hindi

 

माँ हमारी सदानीरा (Self Composed Poem on Mother in Hindi)

माँ हमारी सदानीरा नदी जैसी
महक है वह
फूल वन की
सघन मीठी छाँव जैसी
घने कोहरे में
सुनहरी रोशनी के
ठाँव जैसी
नेह का अमरित पिलाती
माँ हमारी है गंभीरा नदी जैसी

सुबह मिलती
धूप बन कर
शाम कोमल छाँव हो कर
रात भर
रहती अकेली
वह अंधेरों के तटों पर
और रहती सदा हँसती
माँ हमारी महाधीरा नदी जैसी

एक मंदिर
ढाई आखर का
उसी की आरती वह
रोज़ नहला
नेहजल से
हम सभी को तारती वह
हर तरफ़ विस्तार उसका
माँ हमारी सिंधुतीरा नदी जैसी

 

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चहुँ दिशा में सब गुणगान करें (Self Composed Poem on Mother in Hindi)

चहुँ दिशा में सब गुणगान करें

कहते हैं आज अनोखा है

पर तेरी ममता, दिन की तो मोहताज नहीं

हर पल, हर दिन पे नाम तो बस तेरा है

अंकित इस दिन पर आज

सोचूं मैं यही क्या भेंट करूँ

यादों से सजा छोटा सा सफर

सोचूं के मैं इन लम्हों में भरूँ

एहसास भरे वर्णों को

शब्दों में पिरोने की सोची

लेकर कलम फिर हांथों में

मैंने कुछ लिखने की सोची

दुनिया में अगर खुद को ढूँढूँ

एक शब्द (माँ) ही काफी है मुझको

करना हो अगर कष्टों को परे

तेरा मनन ही काफी है मुझको

आओ माँ, ज़रा सा पीछे चलें

कुछ खट्टा मीठा स्मरण करें

याद है वो मेरी परीक्षा और साथ तुम्हारा जागना

वो अच्छे परिणाम पे मुझसे भी ज़्यादा चहकना

वो कविता जो तुमने समझायी

अर्थ बता कर मुझे याद करवाई

वो देश भक्ति का गाना तुमने सिखाया

और तब मुझे मतलब समझ आया

वो सत्य – असत्य, सही- गलत का बोध कराना

वो मुझे खेलते खेलते प्यार से गले लगाना

वो हर फ़रमाईश मेरी, बिन बोले ही जान जाना

कैसे करती हो तुम इतना माँ, कब है ये मैंने जाना?!

ये तो सागर की बूँदें हैं

ऐसी कितनी ही बातें हैं पड़ी

ऐसे कितने ही किस्से हैं रखे

ऊपर वाले से भी ऊपर, तू ही है सबसे बड़ी

जब पास नहीं तुम नज़रों के

तेरी ममता से पुलकित हर सवेरा है

आँखों में सजे जो सपने हैं

तेरे आशीष का डेरा है

दुनिया में अगर खुद को ढूँढूँ

एक शब्द (माँ) ही काफी है मुझको

करना हो अगर कष्टों को परे

तेरा मनन ही काफी है मुझको|

 

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Self Composed Poem on Mother in Hindi

स्नेहपूर्ण स्पर्श (Self Composed Poem on Mother in Hindi)

माँ तुम्हारा स्नेहपूर्ण स्पर्श
अब भी सहलाता है मेरे माथे को
तुम्हारी करुणा से भरी आँखें
अब भी झुकती हैं मेरे चेहरे पर
जीवन की खूंटी पर
उदासी का थैला टाँगते
अब भी कानों में पड़ता है
तुम्हारा स्वर
कितना थक गई हो बेटी
और तुम्हारे निर्बल हाथों को मैं
महसूस करती हूँ अपनी पीठ पर
माँ
क्या तुम अब सचमुच नहीं हो
नहीं,
मेरी आस्था, मेरा विश्वास, मेरी आशा
सब यह कहते हैं कि माँ तुम हौ
मेरी आँखों के दिपते उजास में
मेरे कंठ के माधुर्य में
चूल्हे की गुनगुनी भोर में
दरवाज़े की सांकल में
मीरा और सूर के पदों में
मानस की चौपाई में
माँ
मेरे चारों ओर घूमती यह धरती
तुम्हारा ही तो विस्तार है।

 

Self Composed Poem on Mother in Hindi

 

“माँ” (Self Composed Poem on Mother in Hindi)

कहते है की भगवान को सब पता है,

मैं कहता हूँ,

मेरी
माँ को सब पता है.

मेरे सच से लेकर मेरे झूठ तक,

मेरे हर खोये हुए सामान से लेकर मेरी कॉपी किताब तक.

मेरी भूख मेरी प्यास, मेरे दर्द के हर अहसास तक…

“माँ” को सब पता है |

अनजाने में तेरा आँचल नम किया करता था कभी,

चाहता हूँ की तेरी आँख नम न होने दू कभी,

मेरे विचारों के शुन्य से लेकर हद तक,

“माँ” को सब पता है |

माटी सा रूप है माँ का –
दोस्त, गुरु, सहपाठी,समालोचक;

इस पहर से उस पहर तक…

सब सांचो में ढल जाती माँ

जब जब जो चाहो / तब तब वो मिलता है,

हलवाई से लेकर रसोई तक,

मेलो से झूलों तक,

“माँ” को सब पता है |

“अमन” से लेकर इस चमन के हर फूल तक,

सभी की “माँ” को सब पता है |

 

 

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याद तुम्हारी आई (Self Composed Poem on Mother in Hindi)

हाँ माँ याद तुम्हारी आई, कंठ रूँधा आँखें भर आई
फिर स्मृति के घेरों में तुम मुझे बुलाने आई
मैं अबोध बालक-सा सिसका सुधि बदरी बरसाई
बालेपन की कथा कहानी पुनः स्मरण आई

त्याग तपस्या तिरस्कार सब सहन किया माँ तुमने
कर्म पथिक बन कर माँ तुमने अपनी लाज निभाई
तुमसे ही तो मिला है जो कुछ उसको बाँट रहा हूँ
तुम उदार मन की माता थीं तुमसे जीवन की निधि पाई

नहीं सिखाया कभी किसी को दुख पहुँचाना
नहीं सिखाया लोभ कि जिसका अन्त बड़ा दुखदाई
स्वच्छ सरल जीवन की माँ तुमसे ही मिली है शिक्षा
नहीं चाहिए जग के कंचन ‘औ झूठी पृभुताई

मुझे तेरा आशीष चाहिए और नहीं कुछ माँगू
सदा दुखी मन को बहला कर हर लूँ पीर पराई
यदि मैं ऐसा कर पाऊँ तो जीवन सफल बनाऊँ
तेरे चरणो में नत हो माँ तेरी ही महिमा गाई

Self Composed Poem on Mother in Hindi

 

 

“माँ” का एक प्यार ही मुझको इतना बार बनाकर लाया (Self Composed Poem on Mother in Hindi)

“माँ” का एक प्यार ही मुझको इतना बार बनाकर लाया ,
वरना इस जीवन को मैंने सपनों में भी कभी न पाया ।
कैसे कह दूँ की “माँ” की ममता होती है अफसानों में,
इसके किस्से बन न सके अबतक ये बंद होती है तहखानों में ।
सारा जोबन गाल के उसने तन-मन से औलाद को सींचा,
उसी औलाद के धुत्कारे जाने पर अपने होटों को सदा ही भींचा ।
“माँ” ही जननी ,”माँ” ही देवी,”माँ” की ममता अपरमपार ,
जिस रूप में चाहोगे उसको उसी रूप में मिलेगा प्यार ।
तिरस्कृत हो समाज से वो फिर भी वात्सल्य की आस न छोड़े ,
चाहें बदल जाएँ बच्चे वो फिर भी उनसे मुँह न मोड़े ।
टुकड़ों में बाँट दिया “माँ” को एक “माँ” के पांच बेटों ने,
पर बाँट न सकी वो मरते दम तक उनमे से एक को भी दो टुकड़ों में ।
ऐसी “माँ” को नमन न हो तो अपने जीवन पर है धुत्कार ,
क्योंकि इस जग में लाने की खातिर हमको उसने पार की हैं न जाने कितनी दीवार ?

 

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