लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi

लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi

लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi : किसी निर्जन प्रदेश में संन्यासियों का एक मठ था। वहां देवशर्मा नाम का एक संन्यासी निवास करता था। मठ में आने वाले चढ़ावे के कारण उसके पास बहुत-सा धन एकत्र हो गया था। धन के इकट्ठा हो जाने के कारण वह किसी पर विश्वास नहीं करता था और उस संचित धन की दिन-रात निगरानी करता था।

दूसरों के धन को हड़पने वाले आसाढ़मूर्ति नामक एक धूर्त ने संन्यासी के कक्ष में रखी उस द्रव्यराशि को देखकर सोचा कि किसी तरह यह धन हड़पना चाहिए। यही सोचकर आसाढ़मूर्ति देवशर्मा की शरण में पहुंचा और उसको प्रणाम कर विनीत भाव से बोला-‘भगवन्! यह संसार असार है, पर्वत से गिरने वाली नदी की भांति यह यौवन भी पतनोन्मुख है, मानव जीवन क्षणभंगुर है, संसार के सारे संबंध स्वप्न की भांति असत्य हैं। यह सब तो मैं समझता हूं, कृपा कर अब आप यह बताइए कि वह कौन-सा कर्म है जिसको करने से मैं इस भवसागर को पार कर सकूं?’

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लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi

लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi : आसाढ़मूर्ति की बात सुनकर देवशर्मा ने कहा-तुम तो इस आयु में ही वैराग्य की बातें करने लगे हो वत्स। तुम धन्य हो। बस तुम शिव मंत्र की दीक्षा ले लो तो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।’ ‘तो भगवन्, आप ही मुझे दीक्षा दीजिए। आपसे बढ़कर कौन श्रेष्ठ है !’ ‘ठीक है। मैं तुम्हें दीक्षा दूंगा। किंतु तुम रात्रि में यहां नहीं रह सकोगे। तुम्हें रहने के लिए किसी अन्य जगह का प्रबंध करना होगा। तुम मठ के द्वार पर तृण की कुटिया बनाकर रह सकते हो। यही हम दोनों के लिए श्रेयस्कर रहेगा।’ आसाढ़मूर्ति बोला-‘जैसा आपका आदेश। मेरे लिए तो आपका आदेश ही सर्वोपरि है। ” इस प्रकार अपने वाक्जाल में देवशर्मा को फंसाकर आसाढ़मूर्ति उसका शिष्य बन गया। अब वह नित्यप्रति देवशर्मा की सेवा-शुभूषा में ही लगा रहने लगा।

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लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi :  इससे देवशर्मा तो प्रसन्न हो गया किंतु धन की वह पोटली उसके शरीर से कभी अलग नहीं हुई। यह सोचकर आसाढ़मूर्ति सोचने लगा कि यह धन इस प्रकार तो मेरे हाथ आएगा नहीं, क्यों न इसकी हत्या करके यह धन प्राप्त किया जाए ! आसाढ़मूर्ति ऐसा विचार कर ही रहा था कि देवशर्मा के किसी शिष्य का पुत्र उसको निमंत्रित करने के लिए आया। निमंत्रण पाकर देवशर्मा आसाढ़मूर्ति को साथ लेकर चल पड़ा। आगे चलकर एक नदी मिली। देवशर्मा ने अपनी पोटली गुदड़ी में छिपा ली और आसाढ़मूर्ति से बोला-‘मैं शौच करने के लिए जाता हूं, तब तक तुम भगवान शिव की प्रतिमा से युक्त इस गुदड़ी की सावधानी से रक्षा करते रहना।’ इस प्रकार देवशर्मा उसे वह गुदड़ी पकड़ाकर चला गया। ज्योंही देवशर्मा आंखों से ओझल हुआ, आसाढ़मूर्ति वह गुदड़ी उठाए वहां से भाग लिया। देवशर्मा को अपने शिष्य पर पूरा विश्वास था, जब वह शौच करने निश्चिंतता से बैठा तो उसने देखा कि सामने मेढ़ों का एक झुंड जा रहा है और उसमें दो मेढ़े परस्पर लड़ रहे हैं।

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लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi : वे एक-दूसरे से अपना सिर टकरा रहे थे और उनके सिरों से रक्त टपक रहा था। पास में ही एक गीदड़ मौजूद था जो उनके सिरों से टपकते रक्त को बार-बार चाट लेता था । देवशर्मा सोचने लगा कि यह गीदड़ कितना मूर्ख है, यह नहीं जानता कि यदि परस्पर लड़ते मेढ़ों के बीच फंस गया तो इसका प्राणान्त हो जाएगा। इसी प्रकार का विचार करता हुआ जब देवशर्मा वापस अपने स्थान पर लौटा तो उसने आसाढ़मूर्ति को गायब पाया। उसने अपनी गुदड़ी टटोली तो धन की पोटली नहीं मिली। अब तो देवशर्मा की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। वह भूमि पर गिरा और बेहोश हो गया। होश आया तो वह बुरी तरह विलाप करने लगा। फिर वह रोता-कलपता हुआ आसाढ़मूर्ति के पदचिह्नों का पीछा करता हुआ एक ओर चल पड़ा। सूर्यास्त के समय वह एक ग्राम में जा पहुंचा। पहला ही घर किसी जुलाहे का था। वह जुलाहा मद्यपान के लिए अपनी पत्नी को साथ लेकर नगर की ओर जा रहा था। देवशर्मा ने जब उससे आश्रय मांगा तो जुलाहा अपनी पत्नी को उसके पास छोड़कर स्वयं मद्यपान के लिए नगर को चल दिया। जुलाहे की पत्नी दुश्चरित्र थी।

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लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi : अतिथि सेवा में घर पर रह जाने की बात सुनकर वह प्रसन्न हुई। उसको अपने प्रेमी देवदत्त का स्मरण हो आया। उसने अपने अतिथि देवशर्मा को एक टूटी-फूटी बिना बिस्तर की चारपाई पर लेटने को कहा और बोली-‘भगवन ! मैं किसी अन्य ग्राम से यहां आई अपनी सहेली से मिलकर आती हूं, तब तक आप मेरे घर पर विश्राम कीजिए।’ इस प्रकार जब वह बन-ठनकर अपने प्रेमी से मिलने जाने लगी, तभी नशे में चूर उसका पति लौट आया। पति को आता देख जुलाहे की पली वापस अपने घर में घुस गई किंतु जुलाहे ने उसे बन-ठनकर जाते और वापस लौटते देख लिया था। अपनी पली के दुराचार की बात उसने पहले ही सुन रखी थी, किंतु आज उसने स्वयं अपनी आंखों से देख लिया तो कुद्ध होकर पूछने लगा कि वह कहां जा रही थी?

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लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi : जुलाहे की पली बोली-‘मैं कहां जाती ! तुमको नशा चढ़ा हुआ है इसलिए बहक रहे हो।’ किंतु जुलाहे को संतोष नहीं हुआ। उसने अपनी पत्नी की बहुत पिटाई की और उसे एक खम्भे से बांधकर नशे में सो गया। थोड़ी देर बाद जुलाहिन की एक सहेली, जो एक नाई की पत्नी थी, ने आकर उसे बताया कि उसका प्रेमी देवदत्त उसकी प्रतीक्षा कर रहा है तो वह कहने लगी कि वह कैसे जा सकती है, उसको तो एक खम्भे से बांध दिया गया है। उसने अपनी सहेली से कहा कि वह जाकर उसको कह दे कि आज रात उसका आना संभव नहीं है। नाइन कहने लगी कि यह तो कुलटा का धर्म नहीं है। तब जुलाहिन ने कहा कि फिर वही बताए कि वह किस प्रकार जा सकती है ? इस पर नाइन कहने लगी कि अपने स्थान पर वह उसको बांध दे। उसका पति नशे में प्रात: तक सोया पड़ा रहेगा, उसके जागने से पूर्व ही वह आकर उसके बंधनमुक्त कर स्वयं बंध जाएगी।

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लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi : वैसा ही हुआ | जुलाहिन अपनी जगह नाइन को खम्भे से बांधकर चली गई। उसके जाने के कुछ ही देर बाद जुलाहे की नींद खुल गई। उसका नशा भी कम हो गया था। उसने नाइन को अपनी पत्नी समझ यह कहा कि यदि वह भविष्य में दुराचार न करने का वचन दे तो वह उसको बंधनमुक्त कर सकता है। किंतु बोलने पर कहीं जुलाहा उसकी आवाज पहचान न ले, यही सोचकर भयभीत नाइन ने कोई उत्तर न दिया। उसकी चुप्पी पर जुलाहे को क्रोध आ गया। उसने छुरी लेकर उसकी नाक काट डाली। इसके बाद वह फिर जाकर सो गया। अपने प्रेमी से मिलने के बाद जब जुलाहिन लौटी तो उसने अपनी सहेली नाइन की दुर्दशा देखी। उसने उसके बंधन खोले और उसके स्थान पर स्वयं बंध गई। जब जुलाहे की नींद खुली तो उसने कहा-‘कुलटा ! यदि इस बार भी तू नहीं बोली तो मैं तेरे कान भी काट लूगा।’ यह सुनकर उसकी पली कहने लगी- मूर्ख ! मुझ जैसी सती स्त्री का अपमान करने का साहस किसमें है ? यदि मुझमें सतीत्व है तो देवतागण मेरी नाक को पुनः उसी स्थान पर लगा दें और यदि मुझमें तनिक भी परपुरुष की आकांक्षा हो तो वे मुझे भस्म कर दें।’

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लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi :  इस प्रकार कहने के बाद कुछ क्षण उपरान्त वह बोली-मूर्ख देख, मेरे सतीत्व के प्रभाव से मेरी नाक पुन: यथास्थान लग गई है।’ जुलाहे ने जब अपनी पत्नी की नाक यथास्थान देखी तो वह आश्चर्यचकित रह गया। उसने तुरन्त उसे बंधनमुक्त कर दिया और उसकी चाटुकारी करने लगा। देवशर्मा यह सब देख रहा था। वह विचार कर रहा था कि स्त्रियां असुरों की सारी माया जानती हैं। ये तो हंसते हुए को हंसकर, रोते हुए को रोकर और कुद्ध व्यक्ति को अपने प्रिय वाक्यों से वश में कर लेती हैं। इस प्रकार सोचते हुए देवशर्मा ने वह रात बड़े कष्ट में व्यतीत की। उधर, नाइन जब अपने घर पहुंची तो उसको अपनी नाक को छिपाने के बारे में सोचना पड़ रहा था। वह विचार कर ही रही थी कि उसके पति ने द्वार पर पेटी में से एक उस्तरा निकालकर अपने पति की ओर फेंक दिया। इस पर नाई
को क्रोध आ गया और उसने वह उस्तरा उठाकर वापस अपनी पत्नी की ओर फेंक दिया। बस फिर क्या था, नाइन चिल्ला पड़ी। उसने रोते-चीखते हुए कहना आरंभ कर दिया कि उसके पति ने उसकी नाक काट दी है। उसका शोर सुनकर नगररक्षक वहां आ पहुंचे और उन्होंने नाई को बंदी बना लिया। खड़े होकर आवाज लगाई कि वह उसके औजारों की पेटी पकड़ा दे जिससे वह प्रात:काल नगर में जाकर अपने यजमानों की हजामत आदि कर आए।

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लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi : नाइन ने नाई को न्यायालय में उपस्थित कर उस पर आरोप लगाया गया कि उसने अपनी निरपराध पत्नी की नाक काटी है। न्यायाधीशों ने इसका कारण जानना चाहा तो दुखी नाई कोई उत्तर नहीं दे पाया। इस पर न्यायाधीशों ने उसके मौन को उसकी स्वीकृति मान लिया और उसको प्राणदंड देने का निश्चय कर लिया। सैनिक जब नाई को वधस्थल की ओर ले जाने लगे, तभी देवशर्मा न्यायाधीश के पास पहुंच गया। उसने सारी बात बताई तो नाई को तुरंत दोषमुक्त कर प्राणदान दे दिया गया ।
देवशर्मा अब तक अपना धन जाने का शोक भूल चुका था। वह आगे जाने की अपेक्षा पीछे अपने मठ की ओर लौट चला ।
यह कथा सुनाकर दमनक ने कहा-‘इसलिए मैं कहता हूं कि कभी-कभी अपने दोष के कारण भी मनुष्य को हानि उठानी पड़ती है।’
‘ऐसी स्थिति में हमको क्या करना चाहिए ?’ करटक ने पूछा।

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लालची सन्यासी | Lalachi Sanyasi : ‘बस, एक ही उपाय है।’ दमनक बोला-‘मैं किसी प्रकार अपनी बुद्धि के प्रयोग से संजीवक को राजा से प्रथक कर दूंगा।’
इस पर करटक ने आशंका व्यक्त की – तुम्हारे षड्यंत्र का पता यदि पिंगलक अथवा संजीवक को चल गया तो ?’
‘तब मैं अपने बचाव के लिए कोई और युक्ति सोच लूगा। कहा भी गया है कि बुद्धिमान व्यक्ति को अपना प्रयत्न नहीं छोड़ना चाहिए। उद्योगी पुरुष की तो देवता भी सहायता करते हैं। जैसा कि विष्णु के चक्र और गरुड़ ने युद्ध में कौलिक की सहायता की थी। सुनियोजित षड्यंत्र के रहस्य का तो ब्रह्मा को भी ज्ञान नहीं होता। अपने सुगूढ़ ढोंग के कारण ही कौलिक ने राजकन्या का उपभोग किया था |
करटक ने पूछा-‘वह किस प्रकार ?’
‘सुनो, सुनाता हूं यह कहानी भी।’

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